भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से होगा देश का विकास: राज्यपाल

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जयपुर 
राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा कि प्राचीन भारत में आठ लाख गुरुकुल थे। इनमें व्यावहारिक जीवन के लिए 18 विद्याएं और 64 कलाओं का ज्ञान विद्यार्थियों को दिया जाता था। गुरुकुल में समग्र जीवन से जुड़ा ज्ञान विद्यार्थियों को मिलता था। इसमें नैतिकता को सर्वोच्च स्थान दिया गया था। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ी परंपराओं के संरक्षण की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति प्राचीन ज्ञान से आधुनिक विज्ञान के विकास के समन्वय से भारत के सर्वांगीण विकास से जुड़ी है।

 बागडे सोमवार को पूर्णिमा विश्वविद्यालय में विद्याभारती के सहयोग से आयोजित "भारतीय ज्ञान परंपरा-पारंपरिक ज्ञान से आधुनिक शिक्षा, शोध और नवाचार" विषयक पांच दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे। राज्यपाल ने 16 वीं शताब्दी में महाराणा प्रताप के दरबारी लेखक चक्रपाणी मिश्र का उल्लेख करते हुए कहा कि उसने "विश्व वल्लभ" ग्रन्थ लिखा। इसमें भू जल की खोज, मौसम की भविष्यवाणी, जल शुद्धिकरण, कुंड निर्माण, बावड़ियां और पर्यावरण संरक्षण की विरल जानकारिया हैं। उन्होंने कहा कि यह ग्रन्थ बागवानी, वृक्ष से संबंधित बीमारियां, उन्हें दूर करने के उपायों, कृषि वानिकी आदि की उन्नत तकनीक पर बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां लिए है। उन्होंने कहा कि भारत की ज्ञान परम्परा की यही विशेषता रही है कि वह युगीन संदर्भों में ऐसी उपयोगी तकनीक से जुड़ी थी, जिसे आज आधुनिक विज्ञान कहा जा रहा है।      

उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन शिक्षा प्रणाली मुख्य रूप से वैदिक परंपरा थी। हमारे यहां शिक्षा केवल पाठ्य पुस्तकों पर आधारित नहीं थी बल्कि जीवन के सर्वांगीण विकास से जुड़ी रही है। इसमें नैतिकता को सबसे अधिक प्रमुखता दी गई थी। उन्होंने कहा कि प्रभु राम ने भी गुरुकुल शिक्षा पद्धति से शिक्षा पाई। इसी से वह मर्यादा पुरुषोत्तम हुए। उन्होंने कहा कि विश्वामित्र ने दशरथ से राम को आश्रमों में राक्षसों के उत्पात से बचाने के लिए मांग लिया था। उन्होंने कहा कि विश्वामित्र ने ही सिखाया कि हिंसा का प्रतिकार कई बार जब उसी भाषा में नहीं दिया जाता तो हिंसा से ग्रस्त डरपोक समाज बनता है। हिंसा का प्रतिकार ही हमारे यहां अहिंसा का सर्वोत्तम मार्ग है।   

राज्यपाल ने कहा कि अंग्रेजो ने जब देश पर शासन किया तब जो गजेटियर निकाले उनमें यह सामने आया कि हमारे देश में 8 लाख गुरुकुल थे। भारत तब बहुत बड़ा था। पाकिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका आदि भारत में ही थे। गुरुकुल में शिक्षा निशुल्क थी। इनका खर्च आम जन के सहयोग से निकलता था। प्राचीन शिक्षा में ज्ञान मौखिक रूप में अधिक प्रचलित था। श्रुति परंपरा के साथ शिष्य ज्ञान का श्रवण करते थे। उस पर चिंतन और मनन करते थे। व्यावहारिक जीवन के लिए 18 विद्याएं और 64 कलाएं थी। इनका ज्ञान विधार्थी पाते थे। उन्होंने कहा कि गुरुकुल में समग्र ज्ञान दिया जाता था। शिक्षा कौशल से जुड़ी थी। उन्होंने रणकपुर के जैन मंदिरों का उदाहरण देते हुए कहा कि शिल्प में यह इसीलिए अद्वितीय है कि इसका निर्माण कला कौशल से हुआ था।    
  
राज्यपाल ने कहा कि लार्ड मैकाले ने इसीलिए भारत की शिक्षा पद्धति बदली कि यहां तब नैतिकता प्रबल थी। समृद्ध विरासत थी। अंग्रेजों ने इसलिए यह तरकीब निकाली की देश की शिक्षा पद्धति यदि बदल दी जाती है तो लंबे समय तक देश को गुलाम बनाए रखा जा सकता है। इसके अंतर्गत देश के उद्योग धंधे बंद कर दिए गए। देश के निवासियों को भूखे मरने पर बाध्य किया गया।    
उन्होंने महर्षि कणाद की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने अणु परमाणु का ज्ञान सदियों पहले विश्व को दे दिया था परंतु आधुनिक विज्ञान में उनका नाम नहीं लिया जाता। उन्होंने कहा कि  दशमलव पद्धति का ज्ञान भारत से शुरू हुआ। इसी से दुनिया में गिनती प्रारम्भ हुई। उन्होंने कहा कि पश्चिम में टुकड़ों टुकड़ों में ज्ञान देने की परम्परा है वहीं भारत आरम्भ से ही समग्र ज्ञान के विज्ञान से जुड़ा रहा। प्राचीन भारत कला, चिकित्सा, धातुविज्ञान आदि सभी में अग्रणी था। 

राज्यपाल ने बप्पा रावल की चर्चा करते हुए कहा कि अपने समय में उन्होंने अरबों को भारत से सौ साल के लिए खदेड़ा था। उन्होंने पाकिस्तान में पिंडी यानी विश्राम किया था। उनके नाम से फिर रावल पिंडी नगर बसा था। उन्होंने महर्षि अरविंद घोष के चिंतन आलोक में विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता बढ़ाने, संयम और शांति के साथ नैतिक मूल्यों को बढ़ाए जाने का आह्वान किया।      

सांसद  मदन राठौड़ ने भारतीय ज्ञान परंपरा की चर्चा करते हुए कहा कि भारत में आरम्भ से ही विज्ञान विकसित अवस्था में था। उन्होंने पुराणों की चर्चा करते हुए कहा कि उनमें जो उन्नत विमान, तकनीकी के किस्से कहानियां हैं, उनका आज वैज्ञानिक आधार दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान सोने की चिड़िया कहलाता था, इसलिए पाश्चात्य देश यहां आने के लिए प्रयत्नशील थे। ज्ञान किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, इसे भी हमारे देश ने विश्व को सिखाया। 

इससे पहले राज्यपाल एवं अन्य अतिथियों ने कांफ्रेस के पोस्टर का विमोचन किया। पूर्णिमा विश्वविद्यालय के अध्यक्ष  शशिकांत सिंधी ने शिक्षक प्रशिक्षण से जुड़े कार्यक्रम के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

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