कर्मचारियों को राहत, हादसे की तारीख से ही मुआवजे पर ब्याज देने का हाई कोर्ट का आदेश

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चंडीगढ़.

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 के तहत एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कार्यस्थल दुर्घटना में देय मुआवजे पर ब्याज दावा याचिका दायर होने की तारीख से नहीं, बल्कि दुर्घटना की तारीख से देय होगा।

साथ ही, यदि नियोक्ता निर्धारित अवधि में मुआवजा देने में विफल रहता है और उसके पास देरी का कोई उचित कारण नहीं है, तो उस पर मुआवजे की राशि का 50 प्रतिशत तक जुर्माना भी लगाया जा सकता है। जस्टिस हरकेश मनुजा ने रोशनी व अन्य की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया। मामले में कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त गुरुग्राम ने 27 जुलाई 2017 को मृतक के आश्रितों को 8 लाख 61 हजार 120 रुपये मुआवजा तथा दावा याचिका दायर करने की तारीख से नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया था।

अपीलकर्ताओं ने क्या कहा?
इस आदेश को चुनौती देते हुए अपीलकर्ताओं ने कहा कि अधिनियम की धारा 4ए के अनुसार उन्हें दुर्घटना की तारीख से 12 प्रतिशत वैधानिक ब्याज मिलना चाहिए था। साथ ही नियोक्ता द्वारा समय पर मुआवजा न देने के बावजूद उस पर अधिनियम की धारा 4ए (3) (बी) के तहत जुर्माना भी नहीं लगाया गया। हाई कोर्ट ने कहा कि मुआवजे की राशि को लेकर आयुक्त के निष्कर्षों पर कोई गंभीर विवाद नहीं किया गया, इसलिए उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। हालांकि ब्याज और जुर्माने के मुद्दे पर आयुक्त का आदेश कानून के अनुरूप नहीं था। अदालत ने कहा कि कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम की धारा 4ए नियोक्ता पर यह वैधानिक दायित्व डालती है कि मुआवजा देय होते ही उसका भुगतान किया जाए। यदि एक महीने से अधिक की देरी होती है तो वैधानिक ब्याज देना अनिवार्य है।

जुर्माने के मुद्दे पर अदालत ने क्या कहा?
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के प्रताप नारायण सिंह देव बनाम श्रीनिवास सबाता तथा केरल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बनाम वलसला के मामलों का हवाला देते हुए कहा कि मुआवजा दुर्घटना की तारीख से ही देय हो जाता है, न कि आयुक्त द्वारा निर्णय दिए जाने की तारीख से। पीठ ने कहा कि इस मामले में दुर्घटना 14 फरवरी 2016 को हुई थी, लेकिन आयुक्त ने दावा याचिका दायर होने की तारीख से केवल नौ प्रतिशत ब्याज दिया, जो कानून और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के विपरीत है। इसलिए अपीलकर्ताओं को 14 फरवरी 2016 से वास्तविक भुगतान तक 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया गया। जुर्माने के मुद्दे पर अदालत ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के वेद प्रकाश गर्ग बनाम प्रेमी देवी फैसले के अनुसार ब्याज वैधानिक दायित्व है, जबकि जुर्माना नियोक्ता के व्यक्तिगत आचरण से जुड़ा दंडात्मक प्रविधान है और इसकी जिम्मेदारी बीमा कंपनी पर नहीं डाली जा सकती।

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