Gold नहीं Silver था असली किंग! 4000 साल पहले शुरू हुई चांदी की कहानी, भारत में कैसे बनी सबसे मजबूत करेंसी?

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इंदौर 

भी हम किसी कीमती धातु के बारे में सोचते हैं, तो सबसे पहला नाम 'सोने' (Gold) का आता है। लेकिन अगर आप इतिहास के पन्ने पलटेंगे, तो पाएंगे कि दुनिया की अर्थव्यवस्था और राजाओं की सल्तनत सोने से ज्यादा 'चांदी' (silver) के दम पर चलती थी। आज हम जिस चांदी को पायल, बिछिया या पूजा के बर्तनों के रूप में देखते हैं, वह कभी भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की सबसे ताकतवर 'करेंसी' (मुद्रा) हुआ करती थी।

ऐतिहासिक पन्नों को खंगालने पर पता चलता है कि दुनिया भर की अर्थव्यवस्था और व्यापारिक तंत्र को चलाने में चांदी ने सबसे अहम भूमिका निभाई है। सोने को हमेशा तिजोरियों में छिपाकर रखा गया, लेकिन चांदी वह धातु थी जिसने बाजारों में घूमकर दुनिया का व्यापार चलाया।

व्यापार की पहली सीढ़ी
जब दुनिया में 'वस्तु विनिमय' (Barter System – यानी सामान के बदले सामान) का दौर था, तब बड़े और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारी दिक्कतें आती थीं। भारत में चांदी का पहला इस्तेमाल सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) में देखने को मिलता है। महाजनपद काल और मौर्य साम्राज्य (लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व) में मिली। इस दौरान 'आहत सिक्के' (Punch-Marked Coins) चलन में आए, जिन्हें 'कार्षापण' कहा जाता था। ये पूरी तरह चांदी के बने होते थे।

चांदी के इन सिक्कों ने व्यापार को आसान बना दिया क्योंकि अब हर चीज की एक सटीक कीमत तय हो गई थी। व्यापारियों (श्रेणियों) को सामान ढोने की बजाय सिर्फ चांदी की थैलियां लेकर सफर करना होता था।

'सोना राजाओं का धन, तो चांदी…?
हजारों सालों तक दुनिया का असली व्यापार डॉलर या रुपये से नहीं, बल्कि चांदी के सिक्कों से चला। प्राचीन यूनान, रोम, फारस (पर्शिया) से लेकर यूरोप तक हर साम्राज्य ने अपनी आधिकारिक मुहर वाले चांदी के सिक्के चलाए। उस दौर में एक मशहूर कहावत थी कि "सोना राजाओं की तिजोरी का धन है, लेकिन चांदी आम लोगों का पैसा है।" सोना इतना महंगा था कि आम आदमी की पहुंच से दूर था, इसलिए रोजमर्रा का सारा व्यापार, सैनिकों का वेतन और करों की वसूली चांदी में ही होती थी।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में कैसे चमकी चांदी?
भारत में चांदी की खदानें बहुत कम थीं, तो फिर भारत के पास इतनी चांदी आई कहां से? इसका जवाब है हमारा बेजोड़ एक्सपोर्ट । प्राचीन काल में भारत के सूती कपड़े, रेशम, मलमल और मसालों (खासकर काली मिर्च) का पूरी दुनिया में डंका बजता था। रोम और मिस्र के व्यापारी जब ये सामान खरीदने आते, तो बदले में भारत को भारी मात्रा में चांदी देते थे।

यह व्यापार इतना एकतरफा था कि रोमन इतिहासकार 'प्लिनी' (Pliny) ने दुख जताते हुए लिखा था कि, "रोम का सारा खजाना (चांदी) भारत के विलासिता वाले सामानों (मसाले और रेशम) को खरीदने में बह रहा है।" इसी व्यापार ने भारत को उस दौर की आर्थिक महाशक्ति बना दिया था।

भारत का 'सिल्वर सिंक' बनना और 24% अर्थव्यवस्था
भारत की कहानी सबसे अलग थी। हमारी असली ताकत चांदी पैदा करने में नहीं, बल्कि उसे पूरी दुनिया से खींचने में थी। सिंधु घाटी सभ्यता (करीब 4,000 साल पहले) से ही भारत में चांदी के आभूषण बनते थे।

लेकिन मध्यकाल आते-आते भारत दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक हब (Trade Center) बन गया। भारत के मसाले, मलमल, सूती कपड़े, नील और हस्तशिल्प की मांग पूरी दुनिया में थी। यूरोपीय व्यापारियों (रोम से लेकर अंग्रेजों तक) के पास भारत को देने के लिए कोई सामान नहीं था, इसलिए वे अपने जहाजों में भरकर दुनिया भर की चांदी भारत लाते और बदले में यहां का सामान ले जाते।

रिपोर्ट का मानें तो 1492 में जब यूरोपियों ने अमेरिका (पेरू, बोलिविया, मेक्सिको) की विशाल खदानों पर कब्जा किया, तो वहां से निकली 85% चांदी जहाजों के जरिए घूम-फिरकर भारत ही पहुंची। ब्रिटिश अर्थशास्त्री एंगस मैडिसन के शोध के अनुसार, साल 1700 के आसपास भारत अकेले पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का 24% हिस्सा था। पूरी दुनिया की चांदी भारत की ओर बह रही थी।

मुगलों का खजाना और शेरशाह सूरी का 'रुपया'
आज हम अपनी जेब में जो 'रुपया' (Rupee) रखते हैं, उसका सीधा जन्म भी चांदी से हुआ है। संस्कृत के शब्द 'रूप्य' का अर्थ ही है ढली हुई चांदी। 16वीं सदी में जब अफगान शासक शेरशाह सूरी ने राज किया, तो उसने व्यापार को आसान बनाने के लिए एक तय मानक का चांदी का सिक्का चलाया, जिसे 'रुपया' कहा गया। बाद में मुगलों (अकबर-औरंगजेब) और अंग्रेजों ने भी इसी चांदी के रुपये को अपनी अर्थव्यवस्था का आधार बनाया।

बैंकिंग सिस्टम का जन्म
व्यापार इतना बढ़ गया था कि व्यापारी भारी मात्रा में चांदी के सिक्के लेकर सफर नहीं कर सकते थे (लूटपाट का डर)। यहीं से भारत में 'हुंडी' (Hundi – Promissory Notes) सिस्टम शुरू हुआ। बड़े सेठ और महाजन (जैसे जगत सेठ) अपनी तिजोरियों में व्यापारियों की चांदी जमा कर लेते थे और उन्हें एक 'कागज' (हुंडी) दे देते थे। व्यापारी दूसरे शहर जाकर वो कागज दिखाता और उसे वहां उतनी ही चांदी मिल जाती। यह भारत का पहला 'चेक और बैंकिंग सिस्टम' था, जो पूरी तरह चांदी पर टिका था।

आज के दौर में जिस चांदी से कभी राजाओं की तलवारें और सिक्के बनते थे, आज वह इलेक्ट्रिक वाहनों (EV), 5G नेटवर्क, सोलर पैनल, कंप्यूटर और मोबाइल फोन की जान बन गई है। क्योंकि चांदी बिजली की सबसे बेहतरीन 'कंडक्टर' है।

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