ग्लेशियर टूटे तो मच सकती है तबाही, बद्रीनाथ में 51 मीटर तक मलबे का अनुमान

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नई दिल्ली 
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ और हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों की अस्थिरता ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। खासतौर पर उत्तराखंड में ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों की निगरानी तेज कर दी गई है। उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन मंत्री मदन कौशिक ने अधिकारियों को राज्य में मौजूद ग्लेशियरों और ज्ञात ग्लेशियल झीलों पर लगातार नजर रखने के निर्देश दिए हैं। वैज्ञानिकों का फोकस हैंगिंग ग्लेशियर पर भी है। ये ऐसे बर्फीले हिस्से होते हैं जो बेहद खड़ी पहाड़ी ढलानों या ऊंची घाटियों में स्थित रहते हैं और बड़े ग्लेशियरों से अलग हो सकते हैं।

अप्रैल 2026 में प्रकाशित रिसर्च में मध्य हिमालय के अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई। इनका कुल क्षेत्रफल करीब 71.7 वर्ग किलोमीटर पाया गया और इनमें से लगभग 30 प्रतिशत बर्फ का आयतन ऊपरी अलकनंदा बेसिन में है। हैंगिंग ग्लेशियर इसलिए खतरनाक माने जाते हैं क्योंकि तापमान बढ़ने और ग्लेशियरों के पीछे हटने से उनकी स्थिरता प्रभावित हो सकती है। जब मुख्य ग्लेशियर पिघलकर पीछे हटता है तो उससे जुड़े बर्फ के कुछ हिस्से खड़ी ढलानों पर अलग-थलग पड़ जाते हैं। नीचे से मिलने वाला सहारा कम होने पर ये हिस्से अचानक टूटकर नीचे गिर सकते हैं। ऐसी घटना सिर्फ बर्फ के गिरने तक सीमित नहीं रहती।

कितने विनाशकारी हो सकते हैं ग्लेशियर
ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटने पर बर्फ, चट्टान, बर्फीला मलबा और मिट्टी तेजी से नीचे की ओर बढ़ सकते हैं। रास्ते में यह मलबा और अधिक सामग्री अपने साथ जोड़कर विनाशकारी रूप ले सकता है। इससे नदियों का रास्ता रुक सकता है और पानी जमा होकर बाद में अचानक बाढ़ का कारण बन सकता है। यानी एक ग्लेशियर टूटने की घटना बर्फीले मलबे, भूस्खलन, नदी अवरोध और बाढ़ जैसी कई आपदाओं की शुरुआत कर सकती है।

हैंगिंग ग्लेशियरों से बने बर्फीले मलबे का अध्ययन
उत्तराखंड के लिए खतरे की गंभीरता का अंदाजा इस अध्ययन के मॉडल से लगाया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने 25 हैंगिंग ग्लेशियरों से संभावित बर्फीले मलबे के बहाव का अध्ययन किया। इसके अनुसार बद्रीनाथ क्षेत्र में ऐसे बहाव की अधिकतम ऊंचाई 51 मीटर तक पहुंच सकती है, जो करीब 15 से 17 मंजिला इमारत जितनी है। बद्रीनाथ-माणा सड़क पर यह ऊंचाई 48 मीटर तक आंकी गई। माणा, बद्रीनाथ, हनुमान चट्टी और घांघरिया जैसे इलाके प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं। हालांकि, ये आंकड़े सबसे खराब स्थिति में किए गए अनुमान हैं और इसका मतलब यह नहीं कि किसी खास ग्लेशियर के टूटने या उसके समय की भविष्यवाणी की गई है।

जानें खतरा बढ़ने के क्या कारण
रिपोर्ट के मुताबिक, खतरा इसलिए भी बढ़ रहा है क्योंकि पहाड़ी घाटियों में निर्माण और आबादी लगातार बढ़ रही है। रिसर्च के अनुसार 2000 से 2030 के बीच संभावित प्रभावित क्षेत्रों में निर्मित क्षेत्र 8,025 वर्ग मीटर से बढ़कर 1,51,800 वर्ग मीटर और वहां रहने वाली आबादी 380 से बढ़कर करीब 8,540 हो सकती है। नेपाल की आपदा के पीछे भी ग्लेशियर और चट्टान के टूटने की भूमिका की जांच की जा रही है। वैज्ञानिकों के मुताबिक लैंगटांग लिरुंग चोटी के पास ग्लेशियर और चट्टान का एक हिस्सा पहाड़ की ऊपरी ढलान से अलग हुआ था। गर्म होते मौसम में ग्लेशियर के पीछे हटने से निचले हिस्से का सहारा कम हुआ और वह अस्थिर हो गया।

भारत को अभी क्या करना चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में ऐसे खतरों से निपटने के लिए केवल ग्लेशियरों की पहचान करना काफी नहीं है। लगातार निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, समय पर निकासी और संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण को नियंत्रित करना जरूरी है। 2021 की चमोली आपदा और स्विट्जरलैंड के ब्लाटेन में 2025 की बर्फ-चट्टान आपदा की तुलना करते हुए एक अध्ययन किया गया। इससे पता कि बेहतर निगरानी और समय पर कार्रवाई से जान बचाई जा सकती है। हर हिमस्खलन के समय और स्थान की सटीक भविष्यवाणी संभव नहीं है, लेकिन निगरानी और तैयारी के जरिए संभावित नुकसान को काफी कम किया जा सकता है।

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