84 लाख योनियों का रहस्य: क्या हर आत्मा को सभी योनियों से गुजरना पड़ता है?

Date:

 क्या मृत्यु के बाद मनुष्य फिर से जन्म लेता है? अगर हां, तो उसका अगला जन्म किस रूप में होता है? क्या यह सब केवल भाग्य से तय होता है या हमारे कर्म ही अगली यात्रा का रास्ता बनाते हैं?

हिंदू धर्म के प्राचीन ग्रंथ इन सवालों का बेहद गहरा जवाब देते हैं. पद्म पुराण में 84 लाख योनियों का उल्लेख मिलता है, जबकि गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद जीव की गति को उसके कर्मों से जोड़ा गया है. कुछ महापापों के संदर्भ में ऐसे पुनर्जन्मों का भी वर्णन मिलता है, जिन्हें सुनकर सामान्य मनुष्य हैरान हो सकता है. लेकिन यहीं से एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है.

आज इंटरनेट और सोशल मीडिया पर 84 लाख योनियों को लेकर कई तरह के दावे किए जाते हैं. कहीं कहा जाता है कि हर आत्मा को सभी 84 लाख योनियों में जन्म लेना ही पड़ता है. कहीं हर पाप के लिए एक निश्चित पशु योनि बता दी जाती है. लेकिन क्या हमारे मूल शास्त्र वास्तव में यही कहते हैं? या फिर समय के साथ कुछ लोक मान्यताएं भी शास्त्रों के साथ जुड़ती चली गईं?

आज जानेंगे कि 84 लाख योनियों का उल्लेख कहां मिलता है, क्या हर आत्मा को इन सभी योनियों से गुजरना पड़ता है, मृत्यु के बाद जीव की गति कैसे निर्धारित होती है, कर्म अगले जन्म को किस तरह प्रभावित करते हैं और क्या मनुष्य जन्म-मृत्यु के इस चक्र से मुक्त हो सकता है.

84 लाख योनियों का उल्लेख कहां मिलता है?
पद्म पुराण में एक प्रसिद्ध श्लोक मिलता है-
जलजा नव लक्षाणि स्थावरा लक्षविंशतिः।
कृमयो रुद्रसङ्ख्यकाः पक्षिणां दश लक्षकम्।
त्रिंशल्लक्षाणि पशवश्चतुर् लक्षाणि मानुषाः।।

इस श्लोक में जीवों की विभिन्न योनियों का वर्गीकरण बताया गया है. इसके अनुसार 9 लाख जलचर, 20 लाख स्थावर यानी पेड़-पौधे और अन्य स्थिर वनस्पतियां, 11 लाख कृमि और कीट, 10 लाख पक्षी, 30 लाख पशु और 4 लाख मानव योनियों का उल्लेख मिलता है. इन सभी को मिलाकर संख्या 84 लाख बताई गई है.

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. इस श्लोक का उद्देश्य केवल जीवों की संख्या बताना नहीं माना जाना चाहिए. इसमें सृष्टि में मौजूद जीव-जगत की व्यापकता और विविधता को भी सामने रखा गया है. जल की गहराइयों से लेकर पेड़-पौधों तक, सूक्ष्म जीवों से लेकर पक्षियों और पशुओं तक और फिर मनुष्य तक, सृष्टि के अलग-अलग रूपों का वर्णन किया गया है.

क्या हर आत्मा को 84 लाख योनियों से गुजरना पड़ता है?
यहीं 84 लाख योनियों को लेकर सबसे बड़ा भ्रम पैदा होता है. पद्म पुराण में दिए गए इस श्लोक में योनियों का वर्गीकरण मिलता है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया कि प्रत्येक आत्मा को एक-एक करके सभी 84 लाख योनियों में जन्म लेना ही पड़ेगा.

इसलिए यह कहना कि हर आत्मा पहले जलचर बनेगी, फिर वनस्पति, फिर कीट, फिर पक्षी और फिर पशु-पक्षी की सभी योनियों से गुजरते हुए मनुष्य बनेगी, इस श्लोक से सीधे सिद्ध नहीं होता है.

अगला जन्म किस आधार पर मिलता है?
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण आत्मा और शरीर के संबंध को समझाते हुए कहते हैं कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण करता है, उसी तरह आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है. अर्थात शरीर बदलता है, लेकिन आत्मा को नश्वर शरीर के समान नहीं माना गया है.

क्या केवल एक कर्म से तय होता है अगला जन्म?
यहां एक और जरूरी बात समझनी होगी. अगला जन्म केवल किसी एक कर्म से तय होता है, ऐसा सरल नियम शास्त्रों की पूरी शिक्षा को व्यक्त नहीं करता. कर्मों का संचय, जीवन की प्रवृत्तियां, संस्कार और चेतना जैसे विषय भी इस चर्चा में महत्वपूर्ण माने गए हैं.

श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अंतिम समय के स्मरण और भाव की महत्ता बताते हैं. इसी आधार पर यह समझा जाता है कि मनुष्य जीवन भर जिस भाव और चेतना को विकसित करता है, उसका प्रभाव अंतिम समय पर भी पड़ सकता है. यानी पुनर्जन्म का विषय केवल एक अच्छे या बुरे कर्म की गणना नहीं, बल्कि जीव की व्यापक कर्म-यात्रा से जुड़ा हुआ माना गया है.

क्या महापापों से मिलती है विशेष योनि?
गरुड़ पुराण में कर्मों के फल का विस्तार से वर्णन मिलता है. इसमें कुछ गंभीर पापों के लिए कठोर कर्मफल और विभिन्न गतियों का उल्लेख किया गया है. धर्मशास्त्रीय परंपरा में ब्रह्महत्या, सुवर्ण की चोरी और गुरु-पत्नी के साथ अनुचित संबंध जैसे कर्मों को गंभीर महापापों में गिना गया है. इनके परिणामों के संदर्भ में नरक, कष्ट और पुनर्जन्म जैसी विभिन्न गतियों का वर्णन मिलता है.

लेकिन यहां भी एक सावधानी जरूरी है. हर पाप के लिए एक निश्चित पशु या पक्षी योनि तय है, ऐसा सरल फॉर्मूला पूरे गरुड़ पुराण की शिक्षा को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं करता है. कई प्रसंगों में पहले कर्म के फलस्वरूप कष्ट या नरक का वर्णन आता है और उसके बाद पुनर्जन्म की बात कही जाती है. इसलिए यह कहना कि 'फलां पाप करने पर निश्चित रूप से फलां पशु बनना पड़ता है', हर मामले में शास्त्र का सीधा निष्कर्ष नहीं माना जा सकता है.

मनुष्य जन्म को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया?
अब सवाल उठता है कि अगर जीव अलग-अलग योनियों में जन्म ले सकता है तो मनुष्य जन्म को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है? इसका एक बड़ा कारण है – विवेक.

भोजन, निद्रा, भय और प्रजनन जैसी मूल प्रवृत्तियां मनुष्य के साथ अन्य जीवों में भी देखी जाती हैं. लेकिन मनुष्य में धर्म-अधर्म का विचार करने, अपने कर्मों का चुनाव करने और अपने जीवन की दिशा बदलने की क्षमता विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी गई है.

मनुष्य ज्ञान प्राप्त कर सकता है. तप कर सकता है. दान और सेवा कर सकता है. भक्ति कर सकता है और अपने भीतर के लोभ, क्रोध और अहंकार को नियंत्रित करने का प्रयास कर सकता है. इसलिए भागवत परंपरा में मनुष्य जन्म को दुर्लभ अवसर के रूप में देखा गया है. यह केवल जीवन जीने का अवसर नहीं बल्कि आत्मज्ञान और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर भी माना गया है.

क्या मोक्ष से पुनर्जन्म का चक्र समाप्त हो सकता है?
सनातन धर्म का अंतिम लक्ष्य केवल अच्छा पुनर्जन्म प्राप्त करना नहीं माना गया है. मनुष्य को जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ने की शिक्षा दी गई है. भगवद्गीता में कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग जैसे मार्गों के माध्यम से आत्मिक उन्नति की बात कही गई है.

अर्थात लक्ष्य केवल यह नहीं कि अगला जन्म किस योनि में मिलेगा. उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य अपने कर्मों और चेतना को इतना शुद्ध कर सकता है कि वह पुनर्जन्म के बंधन से ही मुक्त हो जाए.

तो आखिर 84 लाख योनियों का रहस्य क्या है?
पद्म पुराण में जीवों की विभिन्न योनियों का वर्गीकरण मिलता है. गरुड़ पुराण कर्म और कर्मफल के आधार पर जीव की गति का वर्णन करता है. श्रीमद्भागवत महापुराण राजा भरत और अजामिल जैसे प्रसंगों के माध्यम से कर्म, आसक्ति, पश्चाताप और भक्ति की शिक्षा देता है. वहीं श्रीमद्भगवद्गीता आत्मा की नश्वर शरीर से अलग प्रकृति और पुनर्जन्म के सिद्धांत को समझाती है.

इन सभी शिक्षाओं को एक साथ देखें तो एक बात स्पष्ट होती है. 84 लाख योनियों को केवल डराने वाली संख्या के रूप में देखने के बजाय इसे सृष्टि की व्यापकता और जीव की अलग-अलग अवस्थाओं से जोड़कर समझा जा सकता है.

हर आत्मा को एक-एक करके 84 लाख योनियों से गुजरना ही पड़ेगा, ऐसा स्पष्ट शास्त्रीय नियम नहीं मिलता. इसके बजाय कर्म, संस्कार, चेतना और आध्यात्मिक साधना को जीव की आगे की गति से जोड़ा गया है. इसलिए सनातन परंपरा मनुष्य जीवन को बेहद महत्वपूर्ण मानती है. क्योंकि आज हमारे पास जो जीवन है, उसमें हमारे पास अपने कर्म चुनने का अवसर है. हम सत्य, करुणा, सेवा, संयम और भक्ति का मार्ग चुन सकते हैं.

शायद 84 लाख योनियों की सबसे बड़ी सीख यही है कि अगली यात्रा की चिंता करने से पहले हमें यह देखना चाहिए कि हम इस जीवन की यात्रा किस दिशा में ले जा रहे हैं. क्योंकि हमारे आज के कर्म ही हमारी आगे की यात्रा के महत्वपूर्ण आधार माने गए हैं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

जमशेदपुर की वैश्विक औद्योगिक पहचान बरकरार, ग्लोबल सिटीज इंडेक्स में मिली 844वीं रैंक

जमशेदपुर  स्टील सिटी के नाम से मशहूर जमशेदपुर ने एक...

अंकुरित गेहूं से बनाएं स्वादिष्ट हलवा, स्वाद के साथ मिलेगा पोषण भी

मीठा खाने का मन हो तो हलवा एक बढ़िया...

संजय श्रीवास्तव की अध्यक्षता में नागरिक आपूर्ति निगम के वार्षिक आम सभा की बैठक संपन्न

संजय श्रीवास्तव की अध्यक्षता में नागरिक आपूर्ति निगम के वार्षिक...