दिल्ली बर्ड एटलस लॉन्च: 195 लोगों की टीम ने किया 2 साल का सर्वे

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नई दिल्ली
देश की राजधानी दिल्ली केवल राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र ही नहीं, बल्कि पक्षियों की असाधारण विविधता का भी महत्वपूर्ण ठिकाना है. दुनिया की राजधानियों में पक्षी प्रजातियों की समृद्धि के मामले में दिल्ली दूसरे स्थान पर मानी जाती है. इसके बावजूद अब तक यह स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं थी कि शहर के किस हिस्से में कौन-सी पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं.

इस कमी को दूर करते हुए दिल्ली का पहला बर्ड एटलस तैयार किया गया है, जो राजधानी की जैव विविधता का विस्तृत और वैज्ञानिक दस्तावेज माना जा रहा है.

दो वर्षों में तैयार हुआ दिल्ली का पहला पक्षी मानचित्र
दिल्ली सरकार के वन विभाग और बर्ड काउंट इंडिया के संयुक्त प्रयास से तैयार किए गए इस एटलस का उद्देश्य शहर में पक्षियों के वितरण, उनकी संख्या और उनके आवास से जुड़ी जानकारी को व्यवस्थित रूप से संकलित करना था. विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने इसका औपचारिक लोकार्पण किया.

वैज्ञानिक तरीके से हुआ सर्वे
पक्षी सर्वेक्षण को अधिक सटीक बनाने के लिए पूरे दिल्ली क्षेत्र को 6.6 वर्ग किलोमीटर के ग्रिड में विभाजित किया गया. प्रत्येक ग्रिड को आगे छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा गया और उनमें से चयनित क्षेत्रों में विस्तृत अध्ययन किया गया. कुल 145 उपक्षेत्रों में सर्वेक्षण किया गया, जो राजधानी के लगभग 11 प्रतिशत भूभाग का प्रतिनिधित्व करते हैं. अधिकारियों के अनुसार यह प्रक्रिया पक्षी विविधता की संतुलित और वैज्ञानिक तस्वीर सामने लाने के लिए अपनाई गई.

195 प्रतिभागियों ने संभाली जिम्मेदारी
सर्वेक्षण कार्य में पक्षी विशेषज्ञों, प्रकृति प्रेमियों और बर्डवॉचरों की टीमों ने सक्रिय भागीदारी निभाई. दो से पांच सदस्यों वाली टीमों ने विभिन्न मौसमों में क्षेत्रीय निरीक्षण किए. सर्दियों और गर्मियों के दौरान कुल चार चरणों में अध्ययन किया गया, जिससे स्थानीय और प्रवासी दोनों प्रकार के पक्षियों की उपस्थिति दर्ज की जा सके. इस पूरी प्रक्रिया में 195 प्रतिभागियों ने योगदान दिया.

रिकॉर्ड में दर्ज हुईं 221 प्रजातियां
एटलस के पहले वर्ष में 221 पक्षी प्रजातियों की पहचान और रिकॉर्डिंग की गई. इनमें सबसे बड़ी संख्या कीटभक्षी पक्षियों की रही, जिनकी 108 प्रजातियां दर्ज की गईं. इसके अलावा 37 प्रजातियां बीज और वनस्पतियों पर निर्भर पाई गईं, जबकि 34 प्रजातियां सर्वाहारी श्रेणी में शामिल रहीं. छोटे जीवों और मृत पशुओं पर निर्भर 33 प्रजातियां भी दर्ज की गईं. फल और फूलों के रस पर निर्भर पक्षियों की संख्या सबसे कम रही और ऐसी केवल 9 प्रजातियां सामने आईं.

संकटग्रस्त और दुर्लभ पक्षियों की मौजूदगी ने बढ़ाई चिंता और उम्मीद
सर्वेक्षण के दौरान कई ऐसी प्रजातियां भी दर्ज की गईं, जिन्हें संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है. इनमें ब्लैक-बेलीड टर्न जैसी संकटग्रस्त प्रजाति के अलावा ओरिएंटल डार्टर, एशियाई वूली-नेक्ड स्टॉर्क, ब्लैक-हेडेड आइबिस और पेंटेड स्टॉर्क जैसे निकट संकटग्रस्त पक्षी भी शामिल हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इन प्रजातियों की मौजूदगी दिल्ली के प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की अहमियत को दर्शाती है.

यमुना के बाढ़ क्षेत्र और अरावली बने पक्षी विविधता के बड़े केंद्र
विशेषज्ञों के अनुसार अरावली क्षेत्र, यमुना का बाढ़ मैदान, साहिबी नदी के आसपास के इलाके और सेंट्रल एशियन फ्लाइवे जैसे प्राकृतिक कारक दिल्ली को पक्षियों के लिए अनुकूल आवास प्रदान करते हैं. यही वजह है कि राजधानी में बड़ी संख्या में स्थानीय और प्रवासी पक्षी सालभर दिखाई देते हैं.

नीति निर्माण से लेकर संरक्षण तक, कई क्षेत्रों में होगा एटलस का उपयोग
दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने एटलस को केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं बल्कि भविष्य की योजना निर्माण का महत्वपूर्ण उपकरण बताया है. उनके अनुसार पक्षियों के वितरण और मौसमी गतिविधियों का यह दस्तावेज आवास पुनर्स्थापन, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ शहरी विकास की योजनाओं को दिशा देने में मदद करेगा.

अन्य जीव-जंतुओं पर भी ऐसे अध्ययन की जरूरत
बर्ड काउंट इंडिया के क्षेत्रीय समन्वयक पंकज गुप्ता का कहना है कि दिल्ली सरकार द्वारा राज्य स्तर पर पक्षियों के वितरण का इस तरह का डेटा पहली बार तैयार किया गया है. उनका मानना है कि इसी तरह के व्यापक सर्वेक्षण अन्य वन्यजीवों, पौधों और कीटों के लिए भी किए जाने चाहिए, ताकि राजधानी की संपूर्ण जैव विविधता का वैज्ञानिक डेटाबेस विकसित किया जा सके.

 

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