रूसी तेल खरीदने पर भारत पर टैरिफ का खतरा, मार्को रूबियो बोले- रातोंरात निर्भरता खत्म करना मुश्किल

Date:

वाशिंगटन
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने और अन्य देशों पर भारी टैरिफ थोपने से पहले 60 दिनों का समय लेकर इसके वैश्विक और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर का अध्ययन करना चाहते हैं।

उज्बेकिस्तान और भारत यात्रा पर रवाना होने से पहले पत्रकारों से बातचीत में रुबियो ने कहा कि भारत जैसे अहम साझेदार देश के लिए रातों-रात रूसी ऊर्जा पर अपनी निर्भरता खत्म करना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर का 60 दिन अध्ययन करेंगे ट्रंप
रुबियो के अनुसार, प्रस्तावित कानून केवल रूस तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें रूस से ऊर्जा खरीदने वाले भारत जैसे देशों पर भी टैरिफ लगाने का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति यह समझना चाहते हैं कि इन कदमों का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और खुद अमेरिका पर क्या होगा।

इसी को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने राष्ट्रीय हित का हवाला देते हुए लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट के तहत प्रतिबंधों और टैरिफ पर अस्थायी छूट दी है।

भारत की स्थिति को समझना जरूरी
विदेश मंत्री ने रेखांकित किया कि दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति पहले से ही दबाव में है, चाहे वह अमेरिका-ईरान तनाव हो, सऊदी अरब पर हूती हमले हों या रूस-यूक्रेन युद्ध। इन कारणों से वैश्विक तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है।

रुबियो ने कहा कि भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति में विविधता लाने की कोशिश की है, लेकिन वह अब भी रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा आयात करता है। भारत अमेरिका का एक महत्वपूर्ण साझेदार और सहयोगी भी है, इसलिए कोई भी सख्त कदम उठाने से पहले सही संतुलन बनाना आवश्यक है।

रूस से कच्चा तेल क्यों खरीदता है भारत?
फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए, जिसके बाद मॉस्को ने एशियाई देशों को भारी छूट पर कच्चा तेल देना शुरू किया। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता भारत, युद्ध से पहले रूस से 2% से भी कम तेल खरीदता था।

लेकिन सस्ती दरों के चलते भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से खरीद बढ़ाई, जिससे रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया। पिछले महीने भी भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 35% रही।

अमेरिकी कानून पर भारत का रुख
अमेरिकी कांग्रेस में इस विधेयक के पारित होने के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि वह अपने 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

भारत ने दो टूक कहा था कि वह बाजार की परिस्थितियों और स्रोतों के विविधीकरण के आधार पर फैसले लेता रहेगा। साथ ही, भारत ने अमेरिकी अधिकारियों के सामने यह बात साफ कर दी है कि वह अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने को तैयार है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

रूसी तेल पर भारत को अमेरिका से राहत, ट्रंप प्रशासन ने 60 दिन के लिए टाला टैरिफ का फैसला

नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लिंडसे ओ. ग्राहम...

CISF का प्रशासनिक ढांचा बदलेगा, मेट्रो से लेकर सरकारी भवनों तक सुरक्षा व्यवस्था होगी मजबूत

नई दिल्ली केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल यानी CISF एक ऐतिहासिक...

झारखंड में आयुर्वेद चिकित्सा को बढ़ावा, जमशेदपुर में दो एकड़ जमीन पर बनेगा हेल्थ कॉटेज

जमशेदपुर औद्योगिक नगरी के रूप में पहचान रखने वाला जमशेदपुर...