कैंसर मरीज के चेहरे से मौत का अनुमान! नई AI तकनीक पर वैज्ञानिकों का दावा, जानें कैसे करती है काम

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 नईदिल्ली 
क्या किसी के चेहरे की फोटो को देखकर किसी की मौत की भविष्यवाणी की जा सकती है. सुनने में थोड़ी हैरानी लगे लेकिन विज्ञान के इस युग में ऐसा संभव हो गया है. अमेरिका में बोस्टन के मास जनरल ब्रिघम के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी AI तकनीक विकसित की है जिसके माध्यम से कैंसर के मरीजों की मौत की भविष्यवाणी की जा सकेगी. लगभग 30 हजार फोटो पर अपना प्रयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने ऐसा दावा किया है. इस तकनीकी को FAHR-FaceSurvival और FaceAgeनाम दिया गया है. मास जनरल ब्रिघम ने इससे पहले ही चेहरे देखकर बायलॉजिकल एज को मापने का दावा किया था. यानी किसी व्यक्ति का शरीर अंदर से कितने साल का हुआ, इसका पता लगाने का दावा इस कंपनी ने किया था. अब कैंसर मरीजों की मृत्यु दर का दावा किया है. शोधकर्ताओं का कहना है कि 4 करोड़ फोटो को देखने के बाद एआई मॉडल को इसके लिए प्रशिक्षित किया गया है. वाशिंगटन पोस्ट ने लैंसेट का हवाला देते हुए यह बात बताई है. इसकी सच्चाई को लेकर हमने मैक्स अस्पताल नई दिल्ली में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. रवि शंकर से बात की है। 

क्या है रिपोर्ट में 
पहले इस रिपोर्ट की बात करते हैं. वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक जिन लोगों की फोटो FAHR-FaceSurvival स्कोर सबसे ज्यादा 10 था, वे सब 90 दिनों के अंदर मर गए जबकि 10 प्रतिशत से कम स्कोर वाले 2 प्रतिशत लोगों की भी मौत हुई. इसमें बायलॉजिकल उम्र के हिसाब से भविष्यवाणी की गई. अध्ययन के एक लेखक और मास जनरल ब्रिघम कैंसर इंस्टीट्यूट के रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट रेमंड मैक ने कहा हमने पहली बार इस एआई मॉडल से यह साबित किया है कि तस्वीर से न सिर्फ बायलॉजिकल उम्र का पता लगाया जा सकता है बल्कि इससे हम व्यक्ति की मृत्यु दर का भी पता आसानी से लगा सकते हैं. मैक ने कहा कि एक साल पहले हमने फेस एज पर अध्ययन शुरू किया था। 

 इसमें एआई के एल्गोरिदम को इस तरह प्रशिक्षित किया कि वह चेहरे की फोटो से बायलॉजिकल उम्र का सटीक पता लगा ले. अब जो रिजल्ट सामने आया वह पहले से और ज्यादा सटीक था. यह कैंसर रोगियों के सीधे मौत के जोखिम का सटीक भविष्यवाणी करता है. मैक ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि चेहरे की एक ही फोटो का विश्लेषण कर यह एआई फाउंडेशन मॉडल हेल्थ के कई मानकों की सटीक भविष्यवाणी करने में सक्षम है. इस मॉडल के आधार पर मैक और उनकी टीम 30 हजार से अधिक कैंसर रोगियों की तस्वीरों वाले मौजूदा डेटासेट के साथ-साथ उनकी सेहत की जानकारी का उपयोग करने में सक्षम थे. इसमें यह पता लगा कि जिस व्यक्ति की तस्वीर है उसकी मौत कब हुई या यदि वे जीवित है तो कितने दिनों तक जीवित रह पाएंगे। 

शुरुआती दौर के लिए अच्छा कदम
डॉ. रवि शंकर ने बताया कि एआई अब हमारे जीवन को आसान और तेज करने में बहुत मदद कर रहा है. इससे हम इंकार नहीं कर सकते है. यह एआई का जमाना है और आने वाले समय में इसके कई बेहतरीन परिणाम सामने आएंगे. इस तरह देखे तो यह रिसर्च मेंडिकल प्वाइंट ऑफ व्यू से चीजों को देखने के लिए बहुत अच्छा कदम है. इससे पहले वैज्ञानिकों ने FaceAge मॉडल बनाया था. इसमें 4 करोड़ से अधिक तस्वीरों का विश्लेषण करके इंसान की जैविक उम्र यानी बायलॉजिकल उम्र का पता लगाया जाता था। 

 जैविक उम्र का मतलब होता है कि उसके शरीर के अंग जैसे हार्ट, किडनी, लिवर, लंग्स, स्किन, हड्डियां सहित कोशिकाओं की सटीक उम्र क्या हुई है. अब इसी मॉडल को अपग्रेड करके शोधकर्ताओं ने कैंसर मरीजों की संभावित आयु का अनुमान लगाने के लिए AI मॉडल को ट्रेन किया है. बायलॉजिकल रूप से देखा जाए तो बीमारी के दौरान शरीर के अंदर क्या बदलाव आ रहे हैं और कौन से शारीरिक पैरामीटर्स को AI पकड़ रहा है, यह इस रिसर्च पेपर में नहीं बताया गया है. जैसे कोशिकाओं या टिशू या शरीर की कमजोरी को AI किस तरह पकड़ रहा है, इसका पूरा स्पष्टीकरण इस रिसर्च पेपर में नहीं है. यह आगे के अध्ययनों में ही साफ हो सकेगा। 

90 दिनों में मौत की भविष्यवाणी से बेहतर संकेत
रिसर्च के आंकड़ों को समझाते हुए डॉ. रवि शंकर बताते हैं कि अध्ययन में FAHR-FaceSurvival मॉडल के जरिए ’90-डेज मोर्टिलिटी’यानी 90 दिनों के भीतर मौत की दर को जांचा गया. यह बहुत ही दिलचस्प है और इससे भविष्य के संकेतों को परखा गया है. इसमें पाया गया कि जिन मरीजों का AI रिस्क स्कोर सबसे ज्यादा था, उनमें से 50% मरीजों की मौत 90 दिनों के भीतर हो गई जबकि सबसे कम रिस्क स्कोर वाले समूह में यह दर सिर्फ 2% थी. जैविक रूप से यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य संकेत है, जिसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. हालांकि यह अभी बेहद शुरुआती (Premature) डेटा है और इसमें कई कमियां (Flaws) हैं, इसलिए इसके आधार पर फिलहाल अस्पतालों में मरीजों का क्लीनिकल इलाज तय नहीं किया जा सकता। 

भविष्य में संभावनाएं बेहतर होंगी
डॉ. रवि शंकर ने स्पष्ट किया कि इस समय यह AI मॉडल केवल मरीज के जीवित रहने की अवधि का एक मोटा अनुमान भर दे सकता है. इससे कोई ऐसा निश्चित या जैविक रूप से निर्णायक डेटा नहीं मिलता, जिससे मरीज की लाइन ऑफ ट्रीटमेंट या इलाज के तरीकों को बदला जा सके या उसकी उम्र को वास्तव में बढ़ाया जा सके. फिर भी, एक ऑन्कोलॉजिस्ट के नजरिए से चेहरे के बायोमार्कर से स्वास्थ्य का अंदाजा लगाना एक बेहद दिलचस्प वैज्ञानिक शुरुआत है. भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह AI तकनीक जैविक स्तर पर और कितनी सटीक रूप से विकसित होती है। 

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