चंडीगढ़
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अपने दायित्वों में लापरवाही को इस आधार पर नहीं छिपा सकती कि संबंधित महिला का हाव-भाव देखकर उसे गर्भवती होने का आभास नहीं हुआ था।
अदालत ने गर्भवती महिला की मौत के मामले में सेवा से हटाई गई आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की बर्खास्तगी को सही ठहराते हुए उसकी अपील खारिज कर दी। जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने हरियाणा सरकार व अन्य प्रतिवादियों के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि अपीलकर्ता द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण उसकी सेवाओं में गंभीर कमी को उजागर करता है। ऐसे में उसकी संविदात्मक नियुक्ति समाप्त करने के प्रशासनिक निर्णय में कोई खामी नहीं पाई जा सकती।
क्या है मामला?
मामले के अनुसार, पंचकूला निवासी कौशल्या देवी अपने निर्धारित क्षेत्र में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में कार्यरत थी। उसकी जिम्मेदारी क्षेत्र के घरों में जाकर गर्भवती महिलाओं की पहचान करना, उनकी निगरानी करना तथा आवश्यक स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी सेवाओं से जोड़ना था।
इसी दौरान उसके कार्यक्षेत्र में रहने वाली एक गर्भवती महिला की मृत्यु हो गई। हैरानी की बात यह रही कि महिला की गर्भावस्था के संबंध में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की ओर से कोई रिपोर्ट या सूचना विभाग को नहीं दी गई थी।
खंडपीठ ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि इससे पहले एकल पीठ भी सेवा समाप्ति आदेश में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर चुकी थी। एकल पीठ का मानना था कि कार्यकर्ता अपनी सेवा में कमी के लिए कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी।
मृतक परिवार ने नहीं दी जानकारी: अपीलकर्ता
सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता ने दलील दी कि मृतक के परिवार ने उसे गर्भावस्था के बारे में कुछ जानकारी नहीं दी थी। उसने कारण बताओ नोटिस के जवाब में कहा था कि घर के दौरे के दौरान उसने महिला को छत पर तेजी से जाते और गीला भारी कंबल उठाकर घरेलू काम करते देखा था।
उसके अनुसार महिला के हाव-भाव से ऐसा प्रतीत नहीं होता था कि वह गर्भवती है। इस दलील पर कड़ी टिप्पणी करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि यह स्पष्टीकरण पूरी तरह अविश्वसनीय और वास्तविकता से परे है।
अदालत ने कहा कि यह जवाब स्वयं दर्शाता है कि अपीलकर्ता अपने कर्तव्यों का निर्वहन अपेक्षित स्तर पर नहीं कर रही थी। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का दायित्व केवल परिवार से सूचना मिलने का इंतजार करना नहीं, बल्कि सक्रिय रूप से क्षेत्र में गर्भवती महिलाओं की पहचान और निगरानी करना है।
खंडपीठ ने कहा कि जब सेवाओं में इतनी गंभीर कमी सामने आई और कारण बताओ नोटिस देने के बाद ही संविदात्मक नियुक्ति समाप्त की गई, तो इस कार्रवाई में कोई कानूनी त्रुटि नहीं मानी जा सकती। इसी आधार पर अदालत ने अपील को खारिज करते हुए सेवा समाप्ति के आदेश को बरकरार रखा।

