रक्षा तकनीक में बड़ा कदम, IIT रोपड़ विकसित करेगा AI टैंक और लेजर ड्रोन-रोधी सिस्टम

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चंडीगढ़
भारतीय सेना
को आधुनिक और स्वदेशी हथियारों से लैस करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। पंजाब स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), रोपड़ ने आर्मी टेक्नोलॉजी बोर्ड (ATB) से कुल 120 करोड़ रुपये के दो महत्वपूर्ण रक्षा प्रोजेक्ट हासिल किए हैं।

27वें आर्मी टेक्नोलॉजी बोर्ड साइकिल के तहत दिए गए इन प्रोजेक्ट्स का मुख्य उद्देश्य भारतीय सेना के लिए 'स्वायत्त बख्तरबंद वाहन' (Autonomous Armoured Vehicles) और 'डायरेक्टेड एनर्जी वेपन' (Directed Energy Weapons) विकसित करना है। यह कदम न केवल सीमा पर सैनिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि भविष्य की युद्ध तकनीकों में भारत को आत्मनिर्भर भी बनाएगा।

बिना इंसानी मदद के चलेंगे बख्तरबंद वाहन
इस पहल का पहला प्रमुख हिस्सा अगली पीढ़ी के कॉम्बैट प्लेटफॉर्म यानी स्वायत्त बख्तरबंद वाहनों का विकास है। ये ऐसे वाहन या टैंक होंगे जिन्हें चलाने के लिए इंसानों की कम से कम जरूरत पड़ेगी। आईआईटी रोपड़ के निदेशक राजीव आहूजा के अनुसार, ये सिस्टम नेविगेशन, खतरों की पहचान करने और युद्ध के मैदान में सटीक निर्णय लेने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग करेंगे। उन्होंने कहा कि इससे दुश्मन के चुनौतीपूर्ण इलाकों और प्रतिकूल परिस्थितियों में काम कर रहे हमारे सैनिकों के लिए जोखिम काफी कम हो जाएगा।

भविष्य की तकनीक: डायरेक्टेड एनर्जी वेपन (DEW)
आईआईटी रोपड़ का दूसरा प्रोजेक्ट 'डायरेक्टेड एनर्जी वेपन' के विकास से जुड़ा है। ये हथियार आधुनिक युद्ध क्षेत्र के लिए 'गेम-चेंजर' माने जा रहे हैं। इनमें दुश्मनों के खतरों को बेअसर करने के लिए अत्यधिक केंद्रित विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा बीम का इस्तेमाल किया जाता है। निदेशक आहूजा ने बताया कि एंटी-ड्रोन ऑपरेशन, मिसाइल रक्षा प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (Electronic Warfare) अनुप्रयोगों के लिए इन प्रणालियों को आधुनिक युद्ध में बेहद मारक और उपयोगी माना जा रहा है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक विकास को मिलेगा बूस्ट
भारतीय सेना के सैन्य संचालन निदेशालय ) के तहत काम करने वाला एटीबी (ATB) उभरती तकनीकी आवश्यकताओं की पहचान करता है और उन्नत समाधान देने में सक्षम संस्थानों को महत्वपूर्ण अनुसंधान और विकास कार्य सौंपता है। आईआईटी रोपड़ को ये दोनों प्रोजेक्ट रोबोटिक्स, ऑटोनॉमस सिस्टम, फोटोनिक्स और लेजर तकनीक में उसकी विशेषज्ञता के आधार पर मिले हैं।

संस्थान के निदेशक ने इसे सेना द्वारा उनके रिसर्च इकोसिस्टम पर जताए गए भरोसे का प्रतीक बताया है। उन्होंने कहा, "हमारे संकाय और छात्र रक्षा प्रौद्योगिकी डोमेन में कठोर परिश्रम कर रहे हैं। हम इसे राष्ट्रीय सुरक्षा में सीधे योगदान के रूप में देखते हैं और इसे सामरिक रक्षा कार्यक्रमों के लिए आवश्यक अनुशासन के साथ पूरा करेंगे।"

इन प्रोजेक्ट्स का असर केवल सेना तक सीमित नहीं रहेगा। आईआईटी रोपड़ के अधिकारियों का कहना है कि इन रक्षा कार्यक्रमों से क्षेत्र में भारी आर्थिक गतिविधियां भी पैदा होंगी। कलपुर्जों के निर्माण और परीक्षण के लिए स्टार्टअप्स, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) और उद्योग भागीदारों के साथ सहयोग किया जाएगा। रक्षा विशेषज्ञों का भी मानना है कि इस तरह के बड़े तकनीकी कार्यक्रमों से रिसर्च संस्थानों के आसपास एक 'इनोवेशन इकोसिस्टम' तैयार होता है, जिससे रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं और विशेष उद्योगों को बढ़ावा मिलता है।

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