Haryana High Court का बड़ा फैसला, 396 दिन अनुपस्थित पुलिसकर्मी की अनिवार्य रिटायरमेंट कायम

Date:

चंडीगढ़.

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति दंड नहीं बल्कि जनहित में लिया गया प्रशासनिक निर्णय होता है और इसके लिए कर्मचारी के पूरे सेवा रिकॉर्ड को आधार बनाया जा सकता है।

अदालत ने कहा कि पहले दी गई विभागीय सजा के बाद अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश अपने आप में दोहरी सजा नहीं माना जा सकता। जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने करनाल निवासी हरियाणा पुलिस के एक कर्मचारी की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। हालांकि, अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि कर्मचारी के लंबित सेवा लाभ तीन माह के भीतर जारी किए जाएं। पुलिस कर्मी ने एकल पीठ के 11 फरवरी 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी अनिवार्य सेवानिवृत्ति के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी गई थी। उनका तर्क था कि उन्हें पहले ही 396 दिन तक ड्यूटी से गैर-हाजिर रहने के मामले में दंडित किया जा चुका है, इसलिए उसी आधार पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति देना दोहरी सजा के समान है।

हाई कोर्ट ने अस्वीकार की दलील
हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि कानून स्पष्ट है कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती, बल्कि जनहित में यह तय करने का अधिकार नियोक्ता के पास है कि किसी कर्मचारी को आगे सेवा में बनाए रखना उचित है या नहीं। इसके लिए कर्मचारी के पूरे सेवा रिकॉर्ड का मूल्यांकन किया जा सकता है। अदालत ने पाया कि याची को अतीत में कई बार चेतावनी और निंदा जैसी सजाएं मिल चुकी थीं। वर्ष 2017 में उन्हें समय पर अदालत और महाधिवक्ता कार्यालय में उपस्थित नहीं होने पर निंदा की सजा दी गई थी। इसके अलावा 2018 और 2019 में भी विभिन्न मामलों में चेतावनी और निंदा के दंड दिए गए थे।
रिपोर्ट में ईमानदारी पर उठे सवाल
अदालत ने उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों का भी उल्लेख किया, जिनमें उन्हें कई अवसरों पर औसत से नीचे दर्ज किया गया था। एक रिपोर्ट में उनकी ईमानदारी को संदिग्ध बताया गया, जबकि व्यवहार, नेतृत्व क्षमता और सरकारी कार्यों में रुचि को भी संतोषजनक नहीं माना गया था। रिपोर्ट में उन्हें लापरवाह, गैर-जिम्मेदार और अविश्वसनीय कर्मचारी तक कहा गया था। खंडपीठ ने कहा कि इन सभी तथ्यों को देखते हुए सक्षम प्राधिकारी के पास यह निष्कर्ष निकालने के पर्याप्त आधार थे कि कर्मचारी की आगे की सेवा जनहित में नहीं है और वह विभाग के लिए ''डेडवुड'' बन चुका है। अदालत ने माना कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का निर्णय उचित सामग्री पर आधारित था, इसलिए इसमें न्यायिक हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। इसी के साथ अपील को खारिज कर दिया गया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

आउटसोर्स नौकरी का इंतजार बढ़ा, यूपी में अगस्त के बाद ही शुरू होंगी नई भर्तियां

लखनऊ  उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम के माध्यम से सरकारी...

इम्तियाज अली की ‘मैं वापस आऊंगा’ ने दूसरे हफ्ते में भी बॉक्स ऑफिस पर मचाया धमाल

डायरेक्टर इम्तियाज अली की फिल्म मैं वापस आऊंगा ने...

कोयला गैसीकरण परियोजनाओं से बिहार में बड़े निवेश की संभावना, केंद्र ने जताया भरोसा

पटना  कोयला गैसीकरण से संबंधित परियोजनाओं के माध्यम से बिहार...

जयपुर में ताजिया जुलूस को लेकर सुरक्षा कड़ी, ट्रैफिक डायवर्जन और पार्किंग पर रोक

जयपुर जयपुर में मुहर्रम के अवसर पर निकलने वाले ताजिया...