सिख मंत्रियों और विधायकों की पेशी के बाद अकाल तख्त का सख्त रुख, AAP-अकाली दल को दिए 8 बड़े संदेश

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अमृतसर 

पंजाब की राजनीति में इन दिनों एक ऐसा मामला गरमाया हुआ है जिसने सियासत से लेकर धर्म तक हलचल मचा दी है. दरअसल, श्री अकाल तख्त साहिब ने पंजाब सरकार को एक महीने के भीतर बेअदबी कानून में संशोधन करने का आदेश दिया है. 29 जून को पंजाब के सभी दलों के सिख विधायक और कैबिनेट मंत्री नंगे पैर अकाल तख्त पहुंचे और लिखित सफाई के साथ पांच सिंह साहिबानों के सामने पेश हुए. आम आदमी पार्टी के विधायकों ने यहां तक कबूला कि उन्होंने बिना पढ़े ही मसौदा साइन कर दिया. आखिर क्या है अकाल तख्त, कैसे मुख्यमंत्री को दे सकता है आदेश और क्यों बड़ी से बड़ी हस्ती भी झुक जाती है…

अमृतसर में श्री अकाल तख्त साहिब में सिख मंत्रियों-विधायकों की पेशी के बाद ये साफ हो गया कि सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, वह पंथ को नजरअंदाज नहीं कर सकती। सभी दलों के विधायक एक सामान्य सिख की तरह अकाल तख्त पर पेश हुए। 

इस दौरान जत्थेदार के सवालों के आगे बेअदबी कानून को विधायकों की बिना पढ़े मंजूरी से जहां AAP सरकार एक्सपोज हुई। वहीं जत्थेदार ने सरकार को पंजाब में पंथ की अहमियत का भी पाठ पढ़ाया। जत्थेदार ने अकाली दल को भी घेरा तो कांग्रेस खुद को कानून से किनारे करने की कोशिश करते दिखी।

पेशी के दौरान ही मीडिया मैनेजमेंट तक को लेकर जत्थेदार ने सरकार घेर ली। हालांकि आखिर में जत्थेदार ने 6 एतराज जताते हुए कहा कि कानून बनाना और सजा देना सरकार का काम है लेकिन ये एतराज दूर होने चाहिए। इसके लिए एक महीने का टाइम दिया। तब तक कानून होल्ड करने को कहा।

पेशी से बाहर निकले पंजाब विधानसभा के स्पीकर कुलतार संधवां और वित्तमंत्री हरपाल चीमा ने कहा कि जब अकाल तख्त से लिखित एतराज आएंगे तो सरकार उस पर चर्चा करेगी। उसके बाद कानून में बदलाव पर फैसला लेंगे। जानिए, अकाल तख्त में हुई पेशी के असल मायने क्या हैं, इसका आने वाले चुनाव पर क्या असर पड़ेगा। 

श्री अकाल तख्त में मंत्रियों-MLA की पेशी के 8 मायने:-

1. पंजाब में पंथ सुप्रीम, राजनीति धर्म के की नैतिकता माने श्री अकाल तख्त साहिब में बेअदबी कानून को लेकर सिख एमएलए व मंत्रियों की पेशी के दौरान अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज स्पष्ट मैसेज दे दिया कि पंजाब में सिख पंथ (धर्म) सुप्रीम है। उन्होंने पेशी के समय स्पष्ट कहा कि सिख इतिहास और दर्शन में 'मीरी-पीरी' (राजनीति और धर्म) का सिद्धांत सर्वोपरि रहा है, जिसके तहत राजनीति हमेशा धर्म के नैतिकता के दायरे में चलती है।

जत्थेदार गड़गज ने कहा कि आज राजनीति धर्म के पास आई है, जब राजनीति धर्म के साथ चलती है तो इंसाफ होता है। पूरी कैबिनेट व एमएलए का नंगे पैर अकाल तख्त के सामने हाजिर होना यह साबित करता है कि सिख मामलों में आज भी पंजाब की कोई भी चुनी हुई सरकार सर्वोच्च धार्मिक सत्ता श्री अकाल तख्त से ऊपर नहीं है।

2. अकाल तख्त के आगे सियासी ताकत बेअसर पेशी के दौरान जत्थेदार ज्ञानी गड़गज ने नेताओं को श्री अकाल तख्त की पावर दिखाई और साफ कर दिया कि यहां पर जो वो कहेंगे उसके हिसाब से ही प्रोसिडिंग चलेगी। जब सुखपाल खैहरा कह रहे थे तो उसी दौरान आम आदमी पार्टी के कुछ विधायकों व मंत्रियों ने खड़े होकर विरोध करना शुरू किया तो जत्थेदार गड़गज ने दो टूक कह दिया कि यह विधानसभा नहीं है, श्री अकाल तख्त साहिब है।

यहां ये व्यवहार नहीं चलेगा बैठ जाओ। जत्थेदार ने जैसे ही दबका मारा सभी बैठ गए। उन्होंने सुखपाल खैहरा को भी बोलने से रोका। जब खैहरा ने प्रार्थना की तो उसे एक मिनट का समय दिया। टाइम पूरा होते ही खैहरा को भी रोक दिया। यही नहीं जब आप सरकार के मंत्री गुरमीत सिंह खुडि्डयां सरकार के पक्ष में बोलने लगे तो जत्थेदार ने उन्हें भी टोकर बैठा दिया।

3. AAP सरकार एक्सपोज, बिना पढ़े कानून को मंजूरी पेशी के दौरान जत्थेदार ज्ञानी गड़गज ने कानून के संबंध में एक-एक विधायक से सवाल किए। आम आदमी पार्टी के विधायकों ने कहा कि उन्होंने इस पर सहमति दी थी। लेकिन ज्ञानी गड़गज ने जब पूछा कि उन्होंने कानून पढ़ा था तो ज्यादातर ने कह दिया कि नहीं पढ़ा। विधायक मनजीत सिंह ने कहा कि उन्होंने कानून पढ़ा है तो जत्थेदार ने उनसे कस्टोडियन की परिभाषा पूछ ली।

जिस पर उन्होंने कहा कि अगर कोई पागल या बच्चा बेअदबी करता है तो उसके माता पिता कस्टोडियन होंगे और उन्हें सजा दी जाएगी। इस पर ज्ञानी गड़गज ने कटाक्ष करते हुए कहा कि शाबाश ऐसे बुद्धिमान सभी होने चाहिए। कई विधायकों का इस तरह कहना कि उन्होंने कानून पढ़ा ही नहीं, सरकार के लिए भारी शर्मिंदगी का कारण बन गया है। विधायकों के इस कबूलनामे से आप सरकार पूरी तरह से एक्सपोज हो गई कि विधायक व मंत्री कानून पास करने से पहले उसे पढ़ते नहीं हैं।

4. पंथ में सरकार का हस्तक्षेप मंजूर नहीं जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज ने सरकार को आगाह कर दिया कि पंथ से जुड़े मामलों में कोई दखलंदाजी स्वीकार नहीं होगी। पंथ को क्या करना है और क्या नहीं करना है यह सरकार तय नहीं करेगी। जत्थेदार ने कहा कि सिख होने के नाते सुझाव दे सकते हैं, उन्हें मानना या न मानना वो पंथ तय करेगा।

जत्थेदार ने 'बीड़' की जगह 'स्वरूप' शब्द का इस्तेमाल करने और वेबसाइट पर पवित्र स्वरूपों का रिकॉर्ड डालने के लिए 'यूनिक नंबर' जारी करने पर तकनीकी एतराज जताया है। इसका सीधा मायना यह है कि पंजाब विधानसभा या कोई भी सेक्युलर कोर्ट सिख रहित मर्यादा और पंथक शब्दावली को डिक्टेट नहीं कर सकती।

यह अधिकार केवल अकाल तख्त और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) जैसी पंथक संस्थाओं के पास सुरक्षित है। सरकार केवल गुनहगारों को सजा देने के लिए क्रिमिनल एक्ट बना सकती है, मर्यादा तय करने के लिए नहीं।

5.अकाली दल के रवैये पर सवाल सुनवाई के दौरान ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज ने बेअदबी कानून का विरोध न करने पर अकाली दल के रवैये पर भी सवाल खड़े किए। ज्ञानी गड़गज ने अकाली विधायक गनीव कौर मजीठिया से सवाल पूछा कि आपने इसका विरोध किया?, तो उन्होंने कह दिया कि विधानसभा के बाहर विरोध किया है।

जब उनसे कहा कि विधानसभा में इस पर क्या कहा तो गनीव कौर ने कहा कि वो हाजिर नहीं थी। जिस पर ज्ञानी गड़गज ने कहा कि आपको वहां जाकर इसका विरोध करना चाहिए था, गए क्यों नहीं? जिस पर गनीव कौर को सफाई देनी पड़ी और उन्होंने कहा कि ये अंदर बोलने नहीं देते हैं और बेइज्जती करते हैं।

6. AAP के मंत्री-विधायक अकाल तख्त के आगे नतमस्तक बेअदबी कानून को लेकर मुख्यमंत्री भगवंत मान लगातार कहते आ रहे हैं कि हमने बेहतरीन कानून बनाया है और कुछ लोगों को इससे परेशानी है। मुख्यमंत्री कानून के पक्ष में लगातार डटे हुए हैं। उधर, आम आदमी पार्टी सरकार के मंत्री से लेकर विधानसभा स्पीकर श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार के सामने नतमस्तक दिखे।

मंत्री गुरमीत सिंह खुडि्डयां ने बचाव करते हुए कहा कि कानून बेअदबी रोकने के लिए बनाया गया है। सख्त कानून की मांग थी उसको ध्यान में रखकर सख्त सजा वाला कानून बनाया। अगर इस पर श्री अकाल तख्त साहिब को कोई ऐतराज हैं तो उन्हें दूर कर दिया जाएगा। इस दौरान वित्तमंत्री हरपाल चीमा ने अकाल तख्त का ही एक आदेश दिखा कानून का बचाव करने की कोशिश की लेकिन जत्थेदार गड़गज ने कहा कि आपने व्याख्या ही गलत की।

इस आदेश में था कि अगर कहीं बेअदबी होती है तो प्रबंधकों पर कार्रवाई हो। जत्थेदार ने कहा कि यह धार्मिक कार्रवाई के लिए है, जो अकाल तख्त करता है। इसमें कहां कानूनी कार्रवाई लिखी, जो आपने कानून बना दिया।

7. कांग्रेस ने खुद किया बेअदबी कानून से अलग पेशी के दौरान जब जत्थेदार ज्ञानी गड़गज ने कांग्रेस के विधायक व एलओपी से बेअदबी कानून के बारे में पूछा तो वो पूरी तैयारी के साथ आए थे। उन्होंने विधानसभा की अपनी पूरी स्पीच पढ़नी शुरू की और सरकार को घेर लिया। उन्होंने कहा कि सरकार को सुझाव दिया था कि श्री अकाल तख्त साहिब से इस पर सुझाव लिए जाएं, लेकिन इन्होंने नहीं मानी।

यही बात सुखपाल खैहरा व परगट सिंह ने कही। कांग्रेस ने बेअदबी कानून विवाद से खुद को अलग किया और सरकार को घेरा। वहीं नेहरू-मास्टर तारा सिंह समझौते का उल्लेख भी पेशी के दौरान हुआ जिसमें यह तय हुआ था कि बिना एसजीपीसी की सलाह के धार्मिक कानून नहीं बनाया जाएगा। इससे भी कांग्रेस को फायदा मिला और वो अब कहते नजर आ रहे हैं कि नेहरू ने सिख पंथ को सर्वोपरि मानते हुए यह समझौता किया था।

8. मीडिया मैनेजमेंट पर खुलेआम घिर गई सरकार जब पेशी शुरू हुई तो आप विधायक इंदरबीर सिंह निज्जर ने अकाल तख्त के सामने लाइव प्रसारण न करने का अनुरोध किया। जिस पर अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी गड़गज ने कह दिया कि तुम्हारे मुख्यमंत्री ने कहा था कि लाइव करो, सबके पोथड़े खोल दूंगा। जिसने जो पोथड़े खोलने हैं कैमरों के सामने लाइव खोले।

पेशी के दौरान टीवी चैनलों पर अचानक पेशी का लाइव प्रसारण बंद हो गया। जत्थेदार ज्ञानी गड़गज को पता चला तो उन्होंने बीच में ही कह दिया कि सरकार का एक मंत्री अपनी मीडिया टीम से बात करे कि टीवी पर लाइव प्रसारण क्यों बंद करवाया, इसे चलने दो।

उसके बाद उन्होंने कुलतार सिंह संधवा का नाम लेकर कहा कि जल्दी फोन करके चैनलों पर इसका सीधा प्रसारण शुरू करवाओ। वहीं शिअद, कांग्रेस व भाजपा ने लाइव प्रसारण बंद होने पर सरकार को घेर लिया और आरोप लगाए कि सरकार मीडिया को मैनेज करती है।

अकाल तख्त क्या है?  
अकाल तख्त शब्द का मतलब है 'अमर का सिंहासन.' यह सिख धर्म का सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक केंद्र है. यह पंजाब के अमृतसर में स्वर्ण मंदिर (हरमंदिर साहिब) परिसर के ठीक सामने मौजूद है। 

इसकी स्थापना छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद ने 15 जून 1606 (कुछ मान्यताओं के मुताबिक 1609) को की थी. उन्होंने इसे न्याय और राजनीतिक संप्रभुता का प्रतीक बनाया. गुरु हरगोबिंद एक ऐसी जगह बनाना चाहते थे जहां वे धार्मिक के साथ-साथ लौकिक (अस्थायी) मामलों में भी न्याय कर सकें. यही वजह है कि अकाल तख्त को 'सिखों का सर्वोच्च सांसारिक (राजनीतिक) आसन' भी कहा जाता है। 

अकाल तख्त की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह 'हुक्मनामे' (धार्मिक आदेश) जारी कर सकता है. ये हुक्मनामे आध्यात्मिक और लौकिक दोनों तरह के मामलों में सिख समुदाय के लिए बाध्यकारी होते हैं. अकाल तख्त के जरिए से सिख पंथ सामूहिक फैसले लेता है और उसे लागू करवाता है। 

महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल तक भी अकाल तख्त की अथॉरिटी को मान्यता दी जाती थी. हालांकि 1809 के बाद महाराजा रणजीत सिंह ने राजनीतिक गुरमतों को खत्म कर दिया. सिखों औऱ गैर-सिखों दोनों से सलाह लेना शुरू कर दिया, लेकिन धार्मिक मामलों में अकाल तख्त की सर्वोच्चता आज भी बरकरार है. सिख धर्म में कुल 5 तख्त हैं। .

सिख धर्म के यह पांच तख्त कहां-कहां हैं?  
पांच तख्तों में अकाल तख्त सबसे पहला और सुप्रीम है:
क्रमांक     तख्त का नाम     जगह
1.     अकाल तख्त साहिब     अमृतसर, पंजाब
2.     तख्त केशगढ़ साहिब     आनंदपुर साहिब, पंजाब
3.     तख्त दमदमा साहिब     तलवंडी साबो, पंजाब
4.     तख्त पटना साहिब     पटना, बिहार
5.     तख्त हजूर साहिब     नांदेड़, महाराष्ट्र

क्यों बड़ी से बड़ी शख्सियत अकाल तख्त के आगे झुक जाती है?  

अकाल तख्त की अथॉरिटी सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक भी है. इसकी वजहें कई हैं:

    ऐतिहासिक गौरव: यह वही जगह है जहां गुरु हरगोबिंद ने न्याय का प्रतीक स्थापित किया था. छह सदियों का इतिहास इसे अपार सम्मान देता है.
    धार्मिक मान्यता: सिख समुदाय में अकाल तख्त के हुक्मनामे को गुरु का आदेश माना जाता है. इसकी नाफरमानी करना 'गुरु दोखी' (गुरु का द्रोही) माना जाता है. यह सिख समुदाय में सबसे बड़ा कलंक है। 

    पंथ की एकता: अकाल तख्त सिख पंथ की एकता का प्रतीक है. चाहे वह आम आदमी हो या मुख्यमंत्री, सभी के लिए एक ही नियम है। 

    तामसिक अधिकार: अकाल तख्त सिर्फ आध्यात्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक फैसले भी ले सकता है. यही वजह है कि यह मुख्यमंत्री को भी आदेश दे सकता है। 

    सामूहिक सहमति: अकाल तख्त के फैसले पांच सिंह साहिबानों (पांच प्यारों) की सहमति से होते हैं, जो पूरे पंथ का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

आखिर इस बार अकाल तख्त ने पंजाब सरकार को आदेश क्यों दिया?

पंजाब सरकार ने 'जागत ज्योत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) एक्ट-2026' पास किया था. इस कानून का मकसद बेअदबी करने वालों को सजा देना था. लेकिन अकाल तख्त और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने इस कानून के कुछ प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताई. अकाल तख्त की मुख्य आपत्तियां:  

    कानून में सिख शब्दावली, मर्यादा और पंथ से जुड़े मामलों में विधानसभा के फैसले को गलत बताया गया। 

    जत्थेदार कुलदीप सिंह गड़गज ने मुख्यमंत्री भगवंत मान के दो पुराने बयान सुनवाए, जिनमें वह कह रहे थे कि 'अगर बेअदबी करने वाला मानसिक रोगी हुआ तो उसके मां-बाप या कस्टोडियन को सजा मिलेगी.'

    जत्थेदार ने मंत्रियों से सीधा सवाल पूछा, 'क्या कानून की किताब में ऐसी कोई व्यवस्था वास्तव में दर्ज है?' इस पर पंजाब के कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां कोई साफ जवाब नहीं दे सके। 
    आप के कुछ विधायकों ने जत्थेदार के सामने यह हैरान करने वाला कबूलनामा किया कि उन्होंने विधानसभा में कानून का मसौदा ठीक से नहीं पढ़ा था.

अकाल तख्त का आदेश:

    एक महीने के भीतर कानून में संशोधन करें.
    संशोधन होने तक कानून लागू न करें.
    अगर सरकार ने आदेश नहीं माना तो सख्त कार्रवाई की चेतावनी.

क्या अकाल तख्त सच में मुख्यमंत्री को आदेश दे सकता है?

हां, लेकिन यह कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और धार्मिक आदेश है. अकाल तख्त के पास कोई संवैधानिक या कानूनी अधिकार नहीं है कि वह सरकार को मजबूर सके. लेकिन सिख समुदाय में इसकी अपार मान्यता है. जब अकाल तख्त आदेश देता है, तो सिख मंत्री और विधायक उसका पालन करने के लिए बाध्य होते हैं. अगर ऐसा नहीं हुआ तो उन्हें पंथ विरोधी घोषित किया जा सकता है। 

यही वजह है कि 29 जून को आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, अकाली दल और निर्दलीय, सभी दलों के सिख विधायक और मंत्री नंगे पैर अकाल तख्त पहुंचे. यहां तक कि विधानसभा अध्यक्ष भी मौजूद थे. SGPC के सचिव सरदार गुरुचरण सिंह ग्रेवाल बताते हैं, 'भारत में धार्मिक सजा देने वाला सिख समुदाय इकलौता समुदाय है, जहां अकाल तख्त साहिब के तहत सजा दी जाती है. अकाल तख्त से जारी आदेश और नियम कानून पूरी दुनिया के सिखों पर लागू होते हैं. व्यक्तिगत तौर पर तलब करने के साथ ही यह तख्त सिखों से संबंधित संस्थाओं को भी सजा सुनाता है। 

अकाल तख्त सिर्फ एक इमारत नहीं है, यह सिख पंथ की आत्मा है. यह वह जगह है जहां धर्म और राजनीति एक साथ मिलते हैं. हालिया बेअदबी कानून का मामला इस बात का ताजा उदाहरण है कि कैसे अकाल तख्त सिख समुदाय की भावनाओं और मर्यादा की रक्षा के लिए सरकार को भी चुनौती दे सकता है. आप विधायकों के 'बिना पढ़े साइन करने' का कबूलनामा भी इस बात का सबूत है कि अकाल तख्त के सामने कोई भी झूठ नहीं बोल सकता। 

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