श्रीकृष्ण और धर्मग्रंथों पर दावों से उठा विवाद, मौलाना जर्जिस पर सवाल

Date:

लखनऊ
एक ओर, जब पूरा देश महाप्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा का महाउत्सव पूरे हर्षोल्लास से मना रहा है और श्रीकृष्ण जन्मभूमि का प्रकरण जोरों पर है, ठीक उसी समय सनातन आस्था पर प्रहार करने के लिए एक प्रायोजित नैरेटिव गढ़ा जा रहा है। झारखंड में एक तकरीर के दौरान इटावा के विवादित मौलाना जर्जिस ने यह दावा कर दिया है कि योगेश्वर श्रीकृष्ण स्वयं 5 वक्त के नमाजी थे और श्रीमद्भागवत महापुराण में पैगंबर मोहम्मद को 'अंतिम ऋषि' बताया गया है।
जाहिर है, यह कोई अनजाने में की गई गलती नहीं, बल्कि सनातन धर्मग्रंथों, देवी-देवताओं और वैदिक परंपरा के संदर्भों को अपने एजेंडे के लिए बेशर्मी से मोड़ने की एक सोची-समझी साजिश है।
अब सवाल ये उठता है कि आखिर एक मौलाना, जिसका अपना दामन दागदार है, वह हमारे पवित्र धर्मग्रंथों का इस्लामीकरण क्यों करना चाहता है? आइए इस 'जहरीले' नैरेटिव को परत दर परत समझकर इसके पीछे छिपी जिहादी मानसिकता को उजागर करते हैं।  

.तो यह है गीता और वेदों के 'मनमाने इस्लामीकरण' के पीछे की सच्चाई
श्रीमद्भगवत गीता और वेदों के मनमाने 'इस्लामीकरण' की मौलाना जर्जिस का यह दावा कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि यह एक सुव्यवस्थित पैटर्न का हिस्सा है। मौलाना सरेआम दावा करता है कि "श्रीकृष्ण जी भी पांचों वक्त की नमाज पढ़ा करते थे।" इसके लिए वह भगवद्गीता के छठे अध्याय के दसवें श्लोक (योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः…) का हवाला देता है, जो मूल रूप से योग, आत्मसंयम और ईश्वर-चिंतन पर आधारित है।
इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि 'योग की अवस्था प्राप्त करने के इच्छुक साधकों को चाहिए कि वे एकान्त स्थान में रहें और मन एवं शरीर को नियंत्रित कर निरन्तर भगवान के चिन्तन में लीन रहें तथा समस्त कामनाओं और सुखों का संग्रह करने से मुक्त रहें।'
वहीं, सामवेद के मंत्रों का भी आंशिक हिस्सा चुराकर उसका ऐसा अर्थ निकाला जाता है जिससे वह किसी एक विशेष मजहब की तस्दीक करता दिखे।
जाहिर है, श्रीमद्भागवत महापुराण में मोहम्मद के अंतिम ऋषि होने का जो दावा जर्जिस द्वारा किया जा रहा है, उसकी सच्चाई यह है कि किसी भी प्रामाणिक प्रति या स्थापित टीका में ऐसा कोई उल्लेख ही नहीं है। यह एक कपोल कल्पना और कोरा झूठ है।

भविष्य पुराण के साथ भी वही 'पुराना खेल'
इससे पहले, भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व का हवाला देकर भी उसने यही खेल खेलने की कोशिश की थी, जबकि वास्तविकता यह है कि उन श्लोकों का असली अनुवाद जर्जिस जैसों की कलई खोलकर रख देगा, क्योंकि वहां कड़ी टिप्पणी की गई है।
भविष्य पुराण का प्रतिसर्ग पर्व (खण्ड 3) में राजा भोज और कालीदास के बीच संवाद पर आधारित है, जहां वह महामद (पैगंबर मोहम्मद) व उनके अनुयायियों का उल्लेख करते हैं।
मौलाना जर्जिस के अनुसार, यहां 'महामद' (मुहम्मद) नाम के एक शिक्षक या पैगंबर की भविष्यवाणी की गई है। जर्जिस चालाकी से पैगंबर मोहम्मद का उल्लेख करते हुए ये बताने का षड़यंत्र तो करते हैं देखो, सनातनी ग्रंथों में पैगंबर मोहम्मद का उल्लेख है और वे भी उन्हें मानने वाले हैं, जबकि सच इससे कहीं अलग है।
इस पर्व को कोई भी पढ़े तो वह समझ जाएगा कि पुराण के अनुसार, महामद अरब देश में पैदा होंगे। उनके अनुयायी एक विशेष संप्रदाय को मानने वाले होंगे और 'मुसल' (मुसलमान) कहलाएंगे। उनके अनुयायी खतना करने वाले, शिखा नहीं रखने वाले, गाय का मांस खाने वाले होंगे और बिना मूंछ की दाढ़ी रखने वाले होंगे। वे 'अल्ला'  नाम का जाप करेंगे और उनके अनुयायी उच्च अलाप के साथ जोर से प्रार्थना (नमाज़/अज़ान) करेंगे। हालांकि, इसको लेकर भी विवाद है और इसकी प्रमाणिकता की सत्यता संदेह के घेरे में है।
सोचिए, क्या यह वही विवरण है जिसे जर्जिस स्थापित करना चाहते हैं? नहीं, बिलकुल नहीं। जाहिर है, अगर ठीक ऐसा ही कृत्य किसी और ने इस्लाम की किताबों के साथ किया होता, तो अब तक शरिया कानून के हिसाब से 'ईशनिंदा' के फतवे जारी हो चुके होते, लेकिन मौजूदा प्रकरण में 'सुविधाजनक नैरेटिव' के कारण सारे इस्लामिक विद्वानों ने चुप्पी की चादर ओढ़ रखी है।

केवल हिंदुओं तक ही नहीं सीमित है एजेंडा
मौलाना जर्जिस का एजेंडा हिंदू ही नहीं, सिख, जैन, बौद्ध और ईसाई आस्थाओं पर भी प्रहार करता है। वह बाकी सभी धर्मों के आराध्यों को नीचा दिखाकर, केवल अपने मजहब को श्रेष्ठ साबित करने की कुत्सित मानसिकता से ग्रसित है। अपनी तकरीरों में वह ईसा मसीह, गुरु नानक देव, गौतम बुद्ध और भगवान महावीर को केवल 'इंसान' बताता है और उनके अनुयायियों का यह कहकर मजाक उड़ाता है कि उन्होंने अपने महापुरुषों को 'भगवान' बना दिया। मौजूदा तकरीर में तो वह आस्थावानों की आस्था का उपहास करते हुए कहता है कि "हनुमान जी की मूर्ति को देखकर 10 किलो की खोपड़ी हिलाई, बढ़ गया आगे… हो गई पूजा।" यह स्पष्ट रूप से दूसरे समुदाय की आस्था से जुड़े प्रतीकों पर फूहड़ टिप्पणी है।
जाहिर है कि भारत जैसे बहुधार्मिक देश में जब कोई वक्ता दूसरों की आस्था का यूं उपहास उड़ाता है, तो उसका असली मकसद सिर्फ और सिर्फ अपनी विचारधारा की श्रेष्ठता थोपना होता है।
यह जिहादी विचारधारा से ग्रस्त एक निकृष्ट मानसिकता है, जिसका उद्देश्य अपनी धार्मिक-राजनीतिक और सामाजिक श्रेष्ठता को सिद्ध कर झूठे नैरेटिव के जरिए दूसरों को नीचा दिखाना है।

जिनका दामन खुद दागदार, वह सिखा रहे नैतिकता का पाठ
यहां यह भी समझने वाली बात है कि आखिर नैतिकता का ज्ञान दे कौन रहा है। यह सबसे हास्यास्पद और शर्मानाक बात है कि एक मौलाना जिस पर बलात्कारी होने का दोष सिद्ध हो चुका है, वह लोगों को मर्यादा का पाठ पढ़ा रहा है। जो व्यक्ति मंच से लाखों लोगों को धर्म, नैतिकता और शास्त्रों का ज्ञान दे रहा है, उसकी खुद की सार्वजनिक विश्वसनीयता रसातल में है।
वर्ष 2022 में वाराणसी की एक फास्ट ट्रैक अदालत ने इसी मौलाना जर्जिस को दुष्कर्म, ब्लैकमेल और धमकी देने के गंभीर मामले में दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी।
सोचिए, जो व्यक्ति स्वयं बलात्कार और ब्लैकमेलिंग जैसे घिनौने अपराध में सजायाफ्ता हो, वह आज हमारे वेदों, पुराणों और उपनिषदों की मनमानी व्याख्या करके हमें धर्म सिखा रहा है?

शास्त्रार्थ नहीं, बौद्धिक आतंकवाद का मामला
भले ही, कुछ लोग इस वाकये को शास्त्रार्थ का तर्क देने की कोशिश करेंगे, मगर सच यह है कि यह शास्त्रार्थ नहीं बल्कि सनातन के खिलाफ बौद्धिक आतंकवाद है। भारतीय परंपरा शास्त्रार्थ की रही है, जहां मूल ग्रंथों की व्याख्या प्रमाण और संदर्भ के साथ होती है। लेकिन जर्जिस जैसे लोगों का उद्देश्य तुलनात्मक धर्म अध्ययन नहीं है। उनका उद्देश्य वाक्यों को संदर्भ से काटकर एक पूर्वनिर्धारित और प्रायोजित निष्कर्ष तक पहुंचना है।
'श्रीकृष्ण 5 वक्त के नमाजी' से लेकर 'पैगंबर मोहम्मद भागवत महापुराण में बताए गए अंतिम ऋषि' तक के ये झूठे दावे यह साबित करते हैं कि इन्हें शास्त्रों से कोई ज्ञान नहीं लेना है, बल्कि उन्हें सिर्फ अपने कुतर्कों के लिए मनचाहे इस्तेमाल में लाना है। जाहिर है कि धर्मग्रंथों का यह अमर्यादित उपयोग सिर्फ अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए किया जा रहा है, जिससे केवल विवाद पैदा होंगे।
ऐसे में, समय आ गया है कि सनातन समाज इस 'बौद्धिक अतिक्रमण' को पहचाने। हमारी सहिष्णुता और शास्त्रार्थ की महान परंपरा को हमारी कमजोरी समझकर कोई भी मनचाही व्याख्या थोपकर चला जाए, यह बर्दाश्त के योग्य नहीं है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

20 जुलाई दैनिक राशिफल: मेष, वृषभ से मीन तक जानें भविष्यफल

मेष आज का दिन आपके लिए आत्मविश्वास से भरपूर रहने...

टी.टी. नगर स्टेडियम में तीन दिन तक होगी प्रतिभाओं की तलाश

भोपाल  मध्यप्रदेश के उभरते एथलीटों के लिए सोमवार से अपनी...

घर की बाड़ी में उग रहीं जैविक सब्जियां, घट रहा घरेलू खर्च और बढ़ रही पोषण सुरक्षा

रायपुर किचन गार्डन से आत्मनिर्भर बन रहीं बिहान की दीदियां घरों...