बेटे की मौत के बाद भटकता रहा परिवार, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने दिलाया हक

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चंडीगढ़.

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने दीन दयाल उपाध्याय अंत्योदय परिवार सुरक्षा योजना के तहत मुआवजा पाने से वंचित एक महिला को राहत प्रदान की है। अदालत के हस्तक्षेप के बाद हरियाणा परिवार सुरक्षा न्यास ने आश्वासन दिया कि यदि मृत्यु प्रमाणपत्र में दर्ज त्रुटि को ठीक कर लिया गया है तो मुआवजा आवेदन के लिए पोर्टल दोबारा खोला जाएगा।

जस्टिस जगमोहन बंसल ने भावना द्वारा दायर याचिका का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिका के अनुसार भावना के 26 वर्षीय बेटे की 9 मई 2024 को मृत्यु हो गई थी। परिवार पहचान पत्र (पीपीपी) के अनुसार परिवार की वार्षिक आय 1.80 लाख रुपये से कम थी, जिससे परिवार दीन दयाल उपाध्याय अंत्योदय परिवार सुरक्षा योजना के तहत आर्थिक सहायता पाने का पात्र था। बेटे की मृत्यु के बाद याचिकाकर्ता ने 23 मई 2024 को आनलाइन आवेदन कर मुआवजे की मांग की थी।

हालांकि, हरियाणा परिवार सुरक्षा न्यास ने 16 दिसंबर 2024 को दावा खारिज कर दिया। दावा अस्वीकार करने का कारण यह बताया गया कि मृत्यु प्रमाणपत्र और परिवार पहचान पत्र में मृतक के पिता के नाम को लेकर विसंगति थी। इस तकनीकी त्रुटि के कारण आवेदन मंजूर नहीं किया गया।
याचिकाकर्ता ने बाद में संबंधित विभाग से त्रुटि दूर करवाई और 4 मार्च 2025 को संशोधित मृत्यु प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिया। लेकिन समस्या यह रही कि ऑनलाइन पोर्टल पर दोबारा आवेदन करने का कोई विकल्प उपलब्ध नहीं था। इसके बाद उन्होंने कई प्रतिनिधित्व देकर मामले में राहत की मांग की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि यदि याचिकाकर्ता ने वास्तव में मृत्यु प्रमाणपत्र में दर्ज विवरण को परिवार पहचान पत्र के अनुरूप संशोधित करवा लिया है तो हरियाणा परिवार सुरक्षा न्यास का मुख्य कार्यकारी अधिकारी पोर्टल दोबारा खुलवाने पर विचार करेगा, ताकि वह अपना दावा पुन प्रस्तुत कर सके। याचिकाकर्ता की ओर से भी इस व्यवस्था पर सहमति जताई गई। दोनों पक्षों की सहमति को रिकॉर्ड पर लेते हुए हाई कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता हरियाणा परिवार सुरक्षा न्यास, पंचकूला के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करे। इसके बाद संबंधित प्राधिकारी उसके दावे पर आगे की कार्रवाई करेगा। यह फैसला उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिनके वैध दावे केवल दस्तावेजी त्रुटियों या तकनीकी कारणों से लंबित या अस्वीकृत हो जाते हैं।

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