कैंसर के खतरे वाले हर्बिसाइड पर सरकार का बड़ा एक्शन, केंद्र ने लगाया प्रतिबंध; चीन की कोशिश नाकाम

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 नई दिल्ली

दुनिया की प्रमुख एग्रो-केमिकल कंपनियों को अक्सर यह गलतफहमी रहती है कि वे विदेशी प्रमाणपत्रों के सहारे भारतीय बाजार में कोई भी खरपतवारनाशक (Herbicide) आसानी से लॉन्च कर सकती हैं. हालांकि, केंद्र सरकार की सख्ती ने इस भ्रम को तोड़ दिया है. वैश्विक एग्रो-केमिकल दिग्गज सिंजेंटा (Syngenta) के नए खरपतवारनाशक 'एस-मेटोलाक्लोर टेक्निकल 96%' (s-Metolachlor) को भारत में रेगुलेटरी मंजूरी पाने के प्रयासों में बड़ा झटका लगा है. यूरोपीय संघ (EU) द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों और चूहों पर हुए परीक्षणों में ट्यूमर के खतरे को देखते हुए सरकार ने सिंजेंटा के आवेदन पर रोक लगा दी है। 

सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब तक कंपनी यह पूरी तरह से साबित नहीं कर देती कि यह केमिकल भारतीय गांवों के भूजल को प्रदूषित नहीं करेगा और इंसानों के स्वास्थ्य के लिए पूरी तरह सुरक्षित है, तब तक इसे भारतीय कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी जाएगी. उल्लेखनीय है कि सिंजेंटा का स्वामित्व वर्तमान में चीन की सरकारी कंपनी सिनोकेम होल्डिंग्स (Sinochem Holdings) के पास है। 

यह फैसला केंद्रीय कृषि मंत्रालय के तहत काम करने वाली रजिस्ट्रेशन कमेटी (RC) की बैठक में लिया गया है. देश में किसी भी नए कीटनाशक या खरपतवारनाशक के आयात, उत्पादन या बिक्री के लिए लाइसेंस और सर्टिफिकेट जारी करने का जिम्मा इसी कमेटी के पास होता है. केंद्रीय कृषि आयुक्त इस संस्था के प्रमुख होते हैं। 

जब भी कोई कंपनी नए केमिकल की मंजूरी के लिए आवेदन करती है, तो रजिस्ट्रेशन कमेटी उसके दावों की बारीकी से पड़ताल करती है. इस जांच में मुख्य रूप से यह देखा जाता है कि संबंधित केमिकल इंसानों, मवेशियों और पर्यावरण के लिए कितना सुरक्षित है. सुरक्षा के सभी कड़े मानकों पर पूरी तरह खरा उतरने के बाद ही किसी रसायन को भारत में इस्तेमाल की हरी झंडी दी जाती है। 

सिंजेंटा भारत में 'एस-मेटोलाक्लोर' नाम का रसायन आयात कर बेचना चाहती है, जिसका इस्तेमाल खेतों में खरपतवार खत्म करने के लिए किया जाता है. कंपनी का दावा है कि यह बेहद आधुनिक तकनीक पर आधारित दवा है. पुराने हर्बिसाइड्स की तुलना में इसकी केवल 60% खुराक (40% कम छिड़काव) ही काफी है, जिससे किसानों की लागत घटेगी और खेतों पर रसायनों का बोझ भी कम होगा. अपने आवेदन को मजबूत बनाने के लिए सिंजेंटा ने तर्क दिया कि अमेरिका, जापान और कनाडा जैसे विकसित देश इसे पहले ही मंजूरी दे चुके हैं, तो भारत में इसे क्यों रोका जाए?

हालांकि, जब भारत सरकार की तकनीकी समिति ने इस केमिकल के दस्तावेजों और रिपोर्टों की गहराई से समीक्षा की, तो दो ऐसे गंभीर खतरे उजागर हुए जिन्होंने कंपनी के तमाम दावों पर सवाल खड़े कर दिए। 

चूहों को ट्यूमर 
इस दवा का चूहों पर परीक्षण किया गया, तो उनके लीवर में ट्यूमर बन गईं. इस पर सिंजेंटा के एक्सपर्ट्स ने दलील दी कि यह ट्यूमर सिर्फ चूहों को होता है, इंसानों को इससे कुछ नहीं होगा. समिति ने इस दावे को सिरे से खारिज कर द‍िया। 

कमेटी ने स्पष्ट कर दिया है कि कंपनी को ठोस वैज्ञानिक आंकड़े पेश करके यह साबित करना होगा कि इस रसायन का इंसानों की सेहत पर असर नहीं पड़ेगा. इस विषय पर खबर प्रकाशित करने से पहले सिंजेंटा के भारतीय प्रबंधन से उनका आधिकारिक रुख जानने की कोशिश की गई, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला. बहरहाल, एक तरह से यह संकेत साफ है कि सरकार रसायनों से होने वाले कैंसर जैसे गंभीर जोखिमों को लेकर बेहद सतर्क है। 

ऐसे में इस प्रोडक्ट को भारतीय बाजार में उतारने के लिए कंपनी को यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध करना होगा कि जिस केमिकल के संपर्क से चूहों में ट्यूमर विकसित हुआ, वह भारतीय किसानों और खेत-मजबूरों के लिए घातक साबित नहीं होगा। 

इसके अतिरिक्त, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में जहां बड़ी आबादी पीने के पानी के लिए हैंडपंपों और भूजल पर निर्भर है, वहां 'एस-मेटोलाक्लोर' जलस्रोत को दूषित या विषैला नहीं बनाएगा, इसका एक विस्तृत सुरक्षा प्लान और पुख्ता प्रमाण कंपनी को लिखित रूप में देना होगा, इसके बाद ही भारत के कृषि क्षेत्र में इसके इस्तेमाल पर विचार किया जाएगा। 

यूरोप के लिए जहर, भारत में क्यों हो इस्तेमाल
रजिस्ट्रेशन कमेटी ने कंपनी के इस वैश्विक प्रभाव को सिरे से खारिज कर दिया. अधिकारियों ने साफ शब्दों में सवाल उठाया कि यदि यह रसायन इतना ही असरदार और सुरक्षित है, तो यूरोपीय संघ (EU) ने इस पर पूर्ण प्रतिबंध क्यों लगाया है? यूरोप की प्रयोगशालाओं में हुए शोध से यह बात सामने आई है कि यह केमिकल जमीन में रिसकर भूजल को दूषित करता है। 

इसके संपर्क में आने से कैंसर का जोखिम रहता है और यह मानव व अन्य जीवों के डीएनए (DNA) को भी नुकसान पहुंचा सकता है. ऐसे में जब तक सिंजेंटा इन सभी बिंदुओं पर वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत नहीं करती, तब तक इस दवा को भारतीय बाजार और खेतों में उतरने की अनुमति नहीं मिलेगी। 

सरकार का दृष्टिकोण एकदम स्पष्ट है जो केमिकल यूरोप के नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना गया है, उसे भारत में इस्तेमाल की मंजूरी कतई नहीं दी जा सकती। 

सेहत पहले, मुनाफा बाद में
रजिस्ट्रेशन कमेटी ने फिलहाल 'एस-मेटोलाक्लोर' के आवेदन को पूरी तरह से ठंडे बस्ते में डाल दिया है. सरकार ने अपना रुख साफ करते हुए कह दिया है कि जब तक कंपनी यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं कर देती कि यह रसायन भारत के जलस्रोतों को सुरक्षित रखेगा और इसमें कैंसर का कोई जोखिम नहीं है, तब तक देश में इसकी एक भी बोतल बेचने की अनुमति नहीं दी जाएगी। 

यह कड़ा रुख इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए किसी भी रसायन का 'डंपिंग ग्राउंड' नहीं बनेगा. कंपनियों को भारतीय बाजार से मुनाफा कमाने से पहले यहां के पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के कड़े मानकों पर खरा उतरना ही होगा. हालांकि, इस फैसले के बाद यह सवाल भी लाजिमी है कि ग्लाइफोसेट जैसे अन्य विवादित केमिकल्स को लेकर सरकार ऐसी ही सख्ती क्यों नहीं दिखाती?

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