बैंक घोटाला केस में नया मोड़! हरियाणा के दो वरिष्ठ IAS अफसरों की भूमिका पर CBI की नजर

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चंडीगढ़
हरियाणा में हुए 661 करोड़ रुपए के कथित बैंकिंग फ्रॉड मामले की जांच अब ऐसे दौर में पहुंचती दिख रही है, जहां एजेंसियां सिर्फ बैंक रिकॉर्ड और वित्तीय लेन-देन पर नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक ढांचे को भी समझने में जुट गई हैं जिसके भीतर पूरा घटनाक्रम आकार लेता गया।

इसी कड़ी में अब जांच को लेकर एक बड़ा इनपुट सामने आया है। सूत्रों के अनुसार केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) हरियाणा के दो आईएएस अधिकारियों को सरकारी गवाह बनाए जाने की संभावना पर गंभीरता से विचार कर रही है।

जानकारी यह भी सामने आई है कि जिन दो अधिकारियों के नाम पर विचार किया जा रहा है, वे मूल रूप से हरियाणा सिविल सेवा (एचसीएस) से प्रमोट होकर आईएएस बने हैं। प्रशासनिक स्तर पर लंबे अनुभव और विभागीय प्रक्रियाओं की समझ के कारण एजेंसी मान रही है कि उनके पास ऐसी सूचनाएं हो सकती हैं जो इस पूरे मामले की कई अधूरी कड़ियों को जोड़ने में मदद करें।

जांच से जुड़े सूत्रों ने क्या कहा?
जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि एजेंसी का मौजूदा फोकस केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि सरकारी धन किन खातों तक पहुंचा। अब कोशिश यह समझने की भी है कि सरकारी विभागों के खाते किस प्रक्रिया से संचालित हुए, कथित फर्जी एफडीआर कैसे तैयार हुए, रकम के ट्रांसफर को किस स्तर पर मंजूरी मिली और वित्तीय नियंत्रण व्यवस्था में कहां-कहां चूक या मिलीभगत की संभावना बनी।

जांच एजेंसियों का मानना है कि बड़े वित्तीय मामलों में केवल बैंक एंट्री पूरी कहानी नहीं बताती। कई बार फाइलों की आवाजाही, विभागीय आदेश, प्रशासनिक स्वीकृतियां और फैसलों की शृंखला असली तस्वीर सामने लाती है। ऐसे में सिस्टम के भीतर काम कर चुके अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

फिलहाल इस पूरे मामले की जांच सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) दोनों स्तरों पर जारी है। पहले ही कई व्यक्तियों और कथित संस्थाओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ चुकी है।

साथ ही, कुछ अधिकारियों के खिलाफ जांच की अनुमति दिए जाने के बाद मामला प्रशासनिक जवाबदेही के दायरे में भी आ गया है। अब नजर उस संभावित कदम पर टिकी है जिसमें दो आईएएस अधिकारियों को सरकारी गवाह बनाया जा सकता है।
पहले पूछताछ हुई, अब गवाही के विकल्प पर मंथन

सूत्रों के मुताबिक जिन अधिकारियों को लेकर चर्चा चल रही है, उनसे पहले भी पूछताछ की जा चुकी है। पूछताछ के दौरान उपलब्ध कराए गए दस्तावेज, विभागीय नोटिंग और प्रशासनिक रिकॉर्ड के आधार पर एजेंसी को कुछ ऐसे संकेत मिले हैं जिन्होंने जांच को नया आयाम दिया।

बताया जा रहा है कि अब एजेंसी यह आकलन कर रही है कि क्या इन अधिकारियों के पास उपलब्ध जानकारी को औपचारिक रूप से सरकारी गवाही के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

यदि ऐसा होता है तो जांच को घटनाओं का क्रम समझने, निर्णय लेने वाले स्तरों की पहचान करने और अन्य संभावित भूमिकाओं तक पहुंचने में मदद मिल सकती है। सूत्र यह भी मानते हैं कि अंदरूनी गवाही कई बार उन सवालों के जवाब दे देती है जो दस्तावेजों में सीधे दिखाई नहीं देते।

दिल्ली-एनसीआर तक पहुंचा सर्च ऑपरेशन, जांच का दायरा बढ़ा
मामले में हाल के दिनों में जांच एजेंसी ने पहली बार हरियाणा और चंडीगढ़ से बाहर जाकर दिल्ली-एनसीआर तक कार्रवाई का विस्तार किया। कई स्थानों पर एक साथ तलाशी अभियान चलाया गया।

जांच से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इस कार्रवाई के दौरान डिजिटल उपकरण, वित्तीय दस्तावेज, बैंकिंग रिकॉर्ड और कुछ प्रशासनिक सामग्री एजेंसी के कब्जे में आई है। अब इनकी तकनीकी जांच और दस्तावेजी मिलान की प्रक्रिया चल रही है। एजेंसी यह समझने की कोशिश कर रही है कि सरकारी खाते खोलने, धन को अलग-अलग माध्यमों से स्थानांतरित करने और वित्तीय दस्तावेजों के उपयोग के बीच क्या संबंध मौजूद थे।

नोएडा लिंक के बाद और गहरे हुए सवाल
जांच के दौरान नोएडा स्थित एक निजी कंपनी तक पहुंचने के बाद एजेंसियों ने कथित वित्तीय प्रवाह के दूसरे स्तरों की भी पड़ताल तेज कर दी है। संदेह यह है कि सरकारी स्रोतों से निकलने वाली रकम आगे कई चरणों से होकर अन्य खातों या संरचनाओं तक पहुंची हो सकती है। इस दिशा में जुटाए गए रिकॉर्ड और डिजिटल डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है ताकि धन के प्रवाह की पूरी शृंखला को समझा जा सके।

 

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