भारतीय ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा देने की तैयारी, यूपी में स्थापित होंगी शोधपीठें

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 लखनऊ
प्रदेश के विश्वविद्यालयों तथा राजकीय और सहायता प्राप्त महाविद्यालयों में 'भारतीय ज्ञान परंपरा संवर्धन शोधपीठ' स्थापित की जाएंगी। पिछले माह कैबिनेट की बैठक में इस प्रस्ताव को स्वीकृति दी गई थी, जिसके बाद अब उच्च शिक्षा विभाग ने शोधपीठों की स्थापना के लिए दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं।

इसके लिए 50 वर्ष पुराने और पांच हजार से अधिक छात्र संख्या वाले विश्वविद्यालय-महाविद्यालय पात्र होंगे और प्रत्येक चयनित शोधपीठ को पांच वर्षों के लिए दो करोड़ रुपये का एकमुश्त अनुदान दिया जाएगा।
योजना के तहत केवल वही विश्वविद्यालय और महाविद्यालय आवेदन कर सकेंगे, जो यूजीसी अधिनियम की धारा 2(एफ) और 12(बी) के तहत मान्यता प्राप्त होंगे।

प्रत्येक शोधपीठ को मिलने वाली दो करोड़ रुपये की अनुदान राशि को सावधि जमा (एफडी) के रूप में रखा जाएगा। एफडी से मिलने वाले ब्याज से शोधपीठों का नियमित संचालन, शोध परियोजनाएं और अन्य शैक्षणिक गतिविधियां संचालित होंगी। इसके अलावा सीएसआर, दान और अन्य वैधानिक स्रोतों से भी संसाधन जुटाए जा सकेंगे।

उपलब्ध कराई जाएगी अकादमिक सहायता और शोध अनुदान
शोधपीठों में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, जैन एवं बौद्ध दर्शन, आयुर्वेद, योग, भारतीय गणित, खगोल विज्ञान, कृषि विज्ञान, स्थापत्य कला और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर शोध को बढ़ावा दिया जाएगा। पीएचडी, पोस्ट-डाक्टरेट, स्नातक व परास्नातक स्तर के शोधार्थियों को शोध अनुदान और अकादमिक सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी।

योजना के तहत दुर्लभ पांडुलिपियों और प्राचीन ग्रंथों का डिजिटलीकरण भी कराया जाएगा। शोध सामग्री को ओपन-एक्सेस डिजिटल लाइब्रेरी और ओपन आनलाइन कोर्सेज प्लेटफार्म के माध्यम से देश-विदेश के शोधार्थियों तक पहुंचाया जाएगा। भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े डिप्लोमा और सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम शुरू किए जाएंगे तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों, कार्यशालाओं और व्याख्यानमालाओं का नियमित आयोजन होगा।

दिशा-निर्देशों के अनुसार शोधपीठों के चयन के लिए निदेशक उच्च शिक्षा की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति गठित की जाएगी, जबकि प्रत्येक संस्थान में कुलपति या प्राचार्य की अध्यक्षता में संचालन समिति बनेगी।

उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने कहा कि यह पहल उत्तर प्रदेश को भारतीय ज्ञान-विज्ञान के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगी। इससे युवाओं में भारतीय संस्कृति, दर्शन और ज्ञान परंपरा के प्रति गौरव एवं आत्मविश्वास बढ़ेगा, साथ ही शोध और नवाचार को भी नई गति मिलेगी।

 

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