NGT में पेश रिपोर्ट: बिहार के जल और दूध में यूरेनियम का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं

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पटना
बिहार में स्तनपान कराने वाली महिलाओं के दूध में यूरेनियम की मौजूदगी को लेकर पिछले दिनों मीडिया में आई खबरों पर अब देश की सबसे बड़ी परमाणु संस्था ने पूरी तरह विराम लगा दिया है। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बार्क) ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के सामने एक रिपोर्ट पेश करते हुए साफ किया है कि बिहार में मां के दूध में यूरेनियम मिलने का कोई भी वैज्ञानिक संदर्भ या पुख्ता आधार नहीं है। प्राप्त आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, देश भर में करीब 98 फीसदी सतही और ग्राउंड वाटर में यूरेनियम की जो प्राकृतिक मौजूदगी है, वह पूरी तरह से तय सुरक्षा सीमा के भीतर है और इससे इंसानी स्वास्थ्य को कोई खतरा नहीं है। बार्क ने स्पष्ट किया कि चुनिंदा और भ्रामक तरीके से पेश की गई खबरों के कारण जनता, खासकर बच्चों को दूध पिलाने वाली माताओं के मन में बेवजह चिंता पैदा हो गई थी।

शोधकर्ताओं का दावा केवल अनुमान पर आधारित
एनजीटी प्रमुख जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव, विशेषज्ञ सदस्य ए. सेंथिल वेल और अफरोज अहमद की पीठ के सामने दाखिल इस रिपोर्ट में बार्क ने उन सभी दावों को खारिज कर दिया, जिनमें बच्चों के स्वास्थ्य पर खतरे की बात कही जा रही थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार और पंजाब के कुछ इलाकों के ग्राउंड वाटर में यूरेनियम को लेकर शोधकर्ताओं द्वारा किए गए दावे केवल उनके व्यक्तिगत ओवर्व्यू और चुनिंदा व्याख्याओं पर आधारित हैं। बार्क ने यह भी स्पष्ट किया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने ब्रेस्ट मिल्क में यूरेनियम की मात्रा को लेकर कोई भी सुरक्षित या थ्रेशोल्ड लिमिट तय नहीं की है। हालांकि, जांच के दौरान 83 फीसदी नमूनों में सल्फेट, क्लोराइड, नाइट्रेट, फ्लोराइड, टीडीएस, एल्कलिनिटी और हार्डनेस की मात्रा तय सीमा से काफी अधिक पाई गई है।

न्यूक्लियर पावर प्लांट की वजह से नहीं है पानी में यूरेनियम
वैज्ञानिकों ने इस रिपोर्ट में एक और बड़े भ्रम को दूर करते हुए साफ किया कि ग्राउंड वाटर में यूरेनियम की मौजूदगी का देश के किसी भी न्यूक्लियर पावर प्लांट, फ्यूल साइकिल फैसिलिटी या अन्य रेडियोलॉजिकल इंस्टॉलेशन के संचालन से कोई संबंध नहीं है। परमाणु खनिज अन्वेषण एवं अनुसंधान निदेशालय जैसी राष्ट्रीय संस्थाओं की वैज्ञानिक जांचों से यह पुष्टि हुई है कि कुछ इलाकों में यूरेनियम की अधिक मात्रा पूरी तरह से प्राकृतिक भूवैज्ञानिक स्थितियों के कारण है, न कि किसी मानवीय या परमाणु गतिविधि की वजह से। देश भर के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 98 प्रतिशत ग्राउंड वाटर नमूने परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) द्वारा तय किए गए पीने के पानी की 60 माइक्रोग्राम प्रति लीटर की सुरक्षित सीमा के भीतर हैं, इसलिए आम लोगों के लिए किसी भी प्रकार की रेडियोधर्मी या रासायनिक चिंता की कोई बात नहीं है।

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