सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुरूप पीड़ित-केंद्रित जांच, अंतरराज्यीय समन्वय एवं त्वरित कार्रवाई पर दिया गया विशेष बल

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भोपाल 

महिला सुरक्षा शाखा, पुलिस मुख्यालय, भोपाल द्वारा शुक्रवार को पुलिस मुख्यालय के नवीन भवन स्थित कॉन्फ्रेंस हॉल में "Capacity Building Seminar on Investigation & Response to Human Trafficking Cases" विषय पर एक दिवसीय राज्य स्तरीय क्षमता संवर्धन कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में प्रदेश के सभी जिलों के एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (AHTU) के अधिकारी, महिला अपराधों की विवेचना से जुड़े पुलिस अधिकारी तथा विभिन्न विभागों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।

कार्यशाला का शुभारंभ विशेष पुलिस महानिदेशक (महिला सुरक्षा)श्री अनिल कुमार द्वारा किया गया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि मानव दुर्व्‍यापारएक बहुआयामी एवं संगठित अपराध है, जिसकी प्रभावी रोकथाम केवल अपराधियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं हो सकती।

उन्होंने जागरूकता, रोकथाम, बचाव एवं पुनर्वास को मानव दुर्व्‍यापारनिरोधक तंत्र के चार प्रमुख स्तंभ बताते हुए कहा कि पुलिस, अन्य विभागों एवं समाज के समन्वित प्रयासों से ही इस अपराध पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है। उन्होंने सभी जिलों को एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट को और अधिक सक्रिय बनाते हुए लंबित प्रकरणों की नियमित समीक्षा तथा पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने के निर्देश दिए।

उप पुलिस महानिरीक्षकसिमाला प्रसाद ने एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट की भूमिका, सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों तथा मानव दुर्व्‍यापारकी संवेदनशील एवं प्रभावी विवेचना पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रत्येक गुमशुदगी के प्रकरण में मानव दुर्व्‍यापारकी आशंका का गंभीरता से परीक्षण कर पूरे नेटवर्क का पता लगाना आवश्यक है। उन्होंने घटना के बाद पहले 48 घंटे को "गोल्डन आवर" बताते हुए त्वरित कार्रवाई, पीड़ित-केंद्रित एवं निष्पक्ष विवेचना, जनजागरूकता तथा मानव दुर्व्‍यापारसे जुड़े अपराधियों का व्यवस्थित डाटाबेस तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया।

डीआईजी डॉ. किरणलताकेरकेट्टा ने "Bridging the Gaps: Strengthening Investigation & Prosecution of Child Trafficking Cases" विषय पर व्याख्यान देते हुए बाल तस्करी के मामलों में सशक्त विवेचना, प्रभावी अभियोजन तथा विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया।

आवाज़ एनजीओ के निदेशक प्रशांत कुमार दुबे ने "Born to Live, Not to be Sold: Address the Trafficking of Newborn and Adolescent Girls"विषय पर व्याख्यान देते हुए मध्यप्रदेश के नवजात शिशुओं एवं किशोरियों की तस्करी, अवैध दत्तक ग्रहण (Illegal Adoption) तथा इससे जुड़े संगठित अपराधों के विभिन्न आयामों पर विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि ऐसे अपराधों की प्रभावी रोकथाम के लिए संवेदनशील एवं वैज्ञानिक विवेचना, समयबद्ध कार्रवाई तथा विभिन्न विभागों एवं संस्थाओं के बीच समन्वय अत्यंत आवश्यक है।

अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (मुख्यालय), इंदौर डॉ. सीमा अलावा ने भी अपने व्यावहारिक अनुभव साझा करते हुए अवैध दत्तक ग्रहण एवं बाल तस्करी से जुड़े मामलों में साक्ष्य संकलन, पीड़ित-केंद्रित जांच तथा पुलिस, न्यायपालिका एवं संबंधित विभागों के समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर विशेष बल दिया।

इंटरनेशनल जस्टिस मिशन (IJM) की एडवोकेट तृप्ति पाटिल ने "AHTUs As Guardians of Childhood: Combating Trafficking through Early Intervention" विषय पर संबोधित करते हुए कहा कि प्रारंभिक हस्तक्षेप, संवेदनशील समुदायों की पहचान तथा समय रहते की गई कार्रवाई से बाल तस्करी की घटनाओं को प्रभावी रूप से रोका जा सकता है।

कार्यशाला में वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि एएचटीयू की भूमिका केवल पीड़ित के रेस्क्यू तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़ित के सुरक्षित पुनर्वास, काउंसलिंग, संरक्षण, न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग तथा भविष्य में ऐसे अपराधों की रोकथाम के लिए प्रभावी रणनीति तैयार करना भी इसकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संस्थागत समन्वय, त्वरित जांच एवं समयबद्ध विचारण पर दिए गए निर्देशों की जानकारी भी प्रतिभागियों को दी गई।

प्रत्येक जिले की एएचटीयू को राज्य स्तर पर स्थापित एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग ब्यूरो (AHTB) के साथ सतत समन्वय बनाए रखते हुए कार्य करने के निर्देश दिए गए। साथ ही सभी जिलों को लंबित मानव दुर्व्‍यापारप्रकरणों की समीक्षा कर स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कार्ययोजना तैयार करने तथा संवेदनशील क्षेत्रों एवं अपराध के पैटर्न की पहचान कर लक्षित कार्रवाई करने के लिए भी निर्देशित किया गया।

महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, श्रम सहित अन्य संबंधित विभागों तथा सक्रिय स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ नियमित समन्वय स्थापित करने पर विशेष जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि मानव दुर्व्‍यापारजैसे संगठित अपराधों की रोकथाम में पुलिस एवं अन्‍यविभागों तथा सामाजिक संगठनों के संयुक्त प्रयासों से ही प्रभावी परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। इसके लिए प्रत्येक जिले में नियमित समन्वय बैठकें आयोजित कर सूचनाओं के आदान-प्रदान, संयुक्त कार्ययोजना तैयार करने तथा लंबित प्रकरणों की सतत समीक्षा किए जाने की आवश्यकता बताई गई।

कार्यशाला के दौरान मानव दुर्व्‍यापारके मामलों में पुनर्वास की प्रक्रिया को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा गया कि केवल पीड़ित की काउंसलिंग पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके परिवार के सदस्यों की भी समुचित काउंसलिंग की जानी चाहिए, ताकि पारिवारिक परिस्थितियों को समझते हुए पीड़ित का सफल एवं स्थायी पुनर्वास सुनिश्चित किया जा सके।

कार्यक्रम के अंत में सहायक पुलिस महानिरीक्षक (महिला सुरक्षा शाखा)प्रियंका शुक्ला ने सभी विशेषज्ञों, प्रतिभागियों एवं सहयोगी संस्थाओं का आभार व्यक्त किया।

 

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