‘वंदे मातरम्’ का इतिहास: राष्ट्रगीत से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य जो हर भारतीय को जानने चाहिए

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राष्ट्रगीत -वंदे मातरम् : ऐतिहासिक तथ्य

भोपाल

आज देश वंदे मातरम् की 150वी जयंती मना रहा है। भारत के संविधान में 'वंदे मातरम्' गीत को स्वतंत्रता संग्राम में उसके योगदान को देखते हुए राष्ट्रगान 'जन गण मन' के बराबर सम्मान देते हुए 'राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया है। युवा पीढ़ी को वंदे मातरम् गीत के बारे में कुछ ऐतिहासिक तथ्य जानना जरूरी है। प्रस्तुत है मध्यप्रदेश संदेश के जुलाई अंक 2005 को प्रकाशित स्वर्गीय श्री रविन्द्र पंण्ड्या के लेख के अंश।

इस राष्ट्रगीत की रचना स्व. बंकिम चंद्र चटर्जी ने सात नवंबर 1876 को गंगा के किनारे बंगाल के ग्राम कांतलपाडा में की थी। मातृभूमि की वंदना प्रस्तुत करने वाली राष्ट्र गौरव की अमर रचना 'वंदे मातरम्' को उन्होंने अपनी ऐतिहासिक औपन्यासिक कृति 'आनंद मठ' में शामिल किया था। 'आनंद मठ' का प्रकाशन 'बंग दर्शन' पत्रिका में वर्ष 1880 से 1882 के बीच हुआ। पुस्तक के रूप में आनंदमठ का प्रकाशन वर्ष 1882 में हुआ।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 'वंदे मातरम्' सभी भारतवासियों का प्रिय गीत बन गया था तथा इससे राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा लेकर देश को स्वतंत्र करने के लिए राष्ट्रभक्त सपूतों ने कई आंदोलन और अभियान छेड़े। वस्तुतः 'वंदे मातरम्' मातृ भूमि की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का प्रतीक गीत बन गया था। महान शास्त्रीय संगीतकार पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 'वंदे मातरम्' को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसकी शुरूआत उन्होंने लाहौर से की और इसे देश में अनेक स्थानों पर गाया। 'वंदे मातरम्' की उनकी ओजपूर्ण प्रस्तुति सुनकर लोग रोमांच और देशभक्ति की भावना और राष्ट्र अभिमान से भर जाते थे। वर्ष 1896 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में 'वंदे मातरम्' का गायन स्व. रवीन्द्रनाथ टैगोर ने स्वयं किया। यह पहला राजनैतिक अवसर था जब 'वंदे मातरम्' सामूहिक रूप से गाया गया। इस गीत का संगीत भी स्व. टैगोर ने दिया था।

वर्ष 1901 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने दक्षण राजन सेन के संगीत संयोजन में 'वंदे मातरम्' के गायन का अभ्यास किया। रवीन्द्रनाथ टैगोर की भतीजी सरला देवी चौधरानी ने 1905 में 'वंदे मातरम्' पर अंग्रेज सरकार के प्रतिबंध के बावजूद कांग्रेस अधिवेशन में इसे गाया।

वर्ष 1905 में स्वतंत्रता आंदोलन ने संगठित स्वरूप ले लिया था। इसी वर्ष देश की राजनीति ने नया मोड़ लिया। स्वदेशी आंदोलन की घोषणा सात अगस्त 1905 को कलकत्ता में हुई। अंग्रेजों ने 16 अक्टूबर1905 का बंगाल का विभाजन किया। इसके साथ ही पहले बंगाल और फिर पूरे भारत में 'वंदे मातरम्' का घोष देश में गली-गली, मोहल्ले मोहल्ले और स्कूलों में भी होने लगा। 'वंदे मातरम्' आंदोलन के कारण ही इसी वर्ष राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को नागपुर में स्कूल से निकाल दिया गया।

इसके बाद 1915 से प्रत्येक कांग्रेस अधिवेशन 'वंदे मातरम्' राष्ट्रगीत के गायन से शुरू करने की परंपरा बन गई जो अब भी चल रही है। श्री सुभाष चंद्र बोस ने इसे अपनी इंडियन नेशनल आर्मी का गीत बना दिया था तथा सिंगापुर रेडियो स्टेशन से इसका नियमित प्रसारण किया जाता था। 14 अप्रैल 1906 को 'वंदे मातरम्' के कारण कोलकात्ता में एक जुलूस पर लाठी चार्ज किया गया था जिसमें महर्षि अरविंद भी घायल हुए थे। महर्षि अरविंद ने ही 'वंदे मातरम्' का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद भी किया।

महर्षि अरविंद ने 'महायोगी' में लिखा है- 'वंदे मातरम्' राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति है। यह तेजी से पूरे भारत में लोकप्रिय हो रहा है। इसी वजह से यह राष्ट्रगीत के रूप में लाखों लोगों द्वारा गाया जाता है। द केम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया में कहा गया है कि 'वंदेमातरम्' स्वदेशी अभियान की महान भेंट है। 'ए बुक ऑफ इंडिया' में श्री बी.एन. पाण्डे ने लिखा है कि श्री बंकिम चन्द्र चटर्जी की इस काव्य रचना ने शीघ्र ही पूरे भारत के राष्ट्रवादी आंदोलन में अपनी जगह बना ली।

कांग्रेस ने वर्ग 1937 में 'वंदे मातरम्' के पुनरीक्षण के लिए मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, सुभाष चन्द बोस, पंडित जवाहरलाल नेहरू, तथा आचार्य नरेन्द्र देव की एक उप समिति गठित की थी। इस समिति को कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर से भी मार्गदर्शन लेना था। अंततः कांग्रेस कार्यसमिति ने उसी वर्ष 'वंदे मातरम्' के कांग्रेस अधिवेशन में गायन को संशोधित किया और इस राष्ट्रगीत के प्रथम दो छंद ही गाये जाने का निर्णय लिया गया। इसके बाद वर्ष 1938 के हरिपुर कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार 'वंदे मातरम्' के पहले दो छंद ही गाए गए।

देश के स्वतंत्रता आंदोलन से जन-जन को जोड़ने में 'वंदे मातरम्' की विशेष भूमिका थी। लोगों में देशप्रेम और आजादी पाने की अभिलाषा बढ़ाने वाली इस रचना का ही प्रभाव था जब भारत के कोने-कोने से अंग्रेजों को वापिस अपने देश जाने के लिए आवाजें तेज होती गई। इस गीत ने नागरिकों के स्वाभिमान को जगाकर संगठित रूप से राष्ट्र के सम्मान को कायम रखने के लिए जुनून पैदा किया।

भारतीय गणतंत्र की स्थापना के लिए 26 जनवरी, 1950 की तिथि निर्धारित की गयी थी। राष्ट्रपति के निर्वाचन के पहले राष्ट्रगान का चयन होना था। 'वंदे मातरम्' के संबंध में यह आपत्ति उठाई गई थी कि 'जन-गण-मन' के मुकाबले वह बैंड संगीत के लिए उपयुक्त नहीं था।

राष्ट्रगान की धुन के संबंध में यह महसूस किया गया है कि उसमें शब्दों से ज्यादा धुन का महत्व होता है, और इस धुन को न केवल भारतीय संगीत की खूबी का प्रतिनिधित्व करना चाहिए बल्कि कुछ हद तक पश्चिमी संगीत के लिए भी सुविधाजनक होना चाहिए जिससे उसे आर्केस्ट्रा तथा बैंड पर विदेशों में भी आसानी से प्रस्तुत किया जा सके। पुराना अनुभव बताता है कि 'जन गण मन' की धुन ने विदेशों में ज्यादा प्रशंसा पायी है तथा उसे पसंद किया गया है। 'वंदे मातरम्' उसके प्रति महान आकर्षण तथा उसको ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बावजूद विदेशों में आर्केस्ट्रा पर बजाने में ज्यादा सुविधाजनक नहीं है। इस कारण 'वंदे मातरम्' भारत का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगीत रहेगा तथा राष्ट्रगान की धुन जन-गण-मन की रहेगी और 'जन-गण-मन' के शब्दों में आवश्यकतानुसार संशोधन किया जाएगा।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की अध्यक्षता करते हुए यह बयान दिया जो इस विषय पर अंतिम निर्णय माना जाता है :-

'जन-गण-मन' गीत तथा उसका संगीत भारत का राष्ट्रगान है। भारत की स्वतंत्रता के संग्राम में ऐतिहासिक योगदान देने वाले गीत 'वंदे मातरम्' को 'जन-गण-मन' के बराबर सम्मान रहेगा और उसे बराबरी का दर्जा प्राप्त रहेगा।

शासकीय कार्यालयों में राष्ट्रगीत

संसद तथा विधानसभा में 'वंदे मातरम्' का गायन किया जाता है। इसे चरणबद्ध रूप से लागू किया जाय। कार्यालयों में 'वंदे मातरम्' के पहले दो छंद ही गाये जायेंगे। इसकी शुरूआत पहले मंत्रालय तथा जिलाध्यक्ष कार्यालयों से हो गई है। 'वंदे मातरम्' के गरिमापूर्ण गायन को सुनिश्चित करने के लिए सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जायेंगे।

शासकीय कार्यालयों में 'वंदेमातरम्' के गायन का उद्देश्य शासकीय कर्मियों में राष्ट्रभक्ति तथा राष्ट्र सेवा की भावना जगाना है। इससे अनुशासन भी आएगा और शासकीय कर्मियों को समय पर कार्यालय पहुँचने की प्रेरणा भी मिलेगी।

वन्दे मातरम्

सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्

शस्यश्यामलां मातरम्।

शुभ्र ज्योत्स्ना पुलकित यामिनीम्

फुल्ल कुसुमित दुमदल शोभिनीम्

सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्

सुखदां वरदां मातरम्

वन्दे मातरम्

बंकिम चंद्र चटर्जी

(1838-1894)

(साभार मध्यप्रदेश संदेश जुलाई 2026)

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