सरकारी जमीन पर मचा बवाल, प्रभारी मंत्री ने दिए 52 साल पुरानी रजिस्ट्री की जांच के आदेश

Date:

खैरागढ़.

शहर के बहुचर्चित एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क और नजूल भूमि विवाद ने अब नया मोड़ ले लिया है। करीब 85 हजार वर्गफीट जमीन और 40 करोड़ रुपए से अधिक की अनुमानित कीमत से जुड़े इस मामले में 52 साल पुरानी रजिस्ट्री, सरकारी रिकॉर्ड और कथित प्लॉटिंग को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विवाद बढ़ने के बाद अब प्रभारी मंत्री लखनलाल देवांगन ने भी मामले की जांच के संकेत दिए हैं।

1974 की रजिस्ट्री से शुरू हुआ विवाद
सामने आए दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 1974 में प्लॉट क्रमांक 114 और 115 की रजिस्ट्री अवयस्क स्मृति सिंह के नाम की गई थी। रजिस्ट्री में इन भूखंडों का उल्लेख “एडवर्ड पार्क” और “बाड़ी एडवर्ड पार्क” के रूप में दर्ज है। दस्तावेज में तत्कालीन राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह विक्रेता के रूप में दर्ज हैं, जबकि आम मुख्तियार के रूप में रविंद्र बहादुर सिंह के हस्ताक्षर हैं। क्रेता पक्ष में अवयस्क स्मृति सिंह की ओर से उनकी माता एवं संरक्षिका रश्मि देवी सिंह का नाम दर्ज है। उस समय जमीन का विक्रय मूल्य मात्र 3 हजार रुपए दर्शाया गया था। विवाद इसलिए भी गहरा गया है क्योंकि रजिस्ट्री में शामिल प्रमुख नाम एक ही राजपरिवार से जुड़े बताए जा रहे हैं।

सरकारी रिकॉर्ड में पार्क और सार्वजनिक भूमि का उल्लेख
मामले में सबसे बड़ा सवाल सरकारी अभिलेखों को लेकर उठ रहा है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार खसरा नंबर 167, 169 और 170 में सड़क, रास्ता, घास भूमि और छोटे झाड़ का जंगल दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। वहीं नजूल मेंटेनेंस खसरे में प्लॉट नंबर 114 को “एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क” और प्लॉट नंबर 115 को “बाड़ी एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क” के रूप में दर्ज बताया गया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि यह भूमि सार्वजनिक उपयोग या पार्क की श्रेणी में थी, तो इसका भूमि उपयोग परिवर्तन कब और किस प्रक्रिया के तहत हुआ? अब तक इससे संबंधित कोई स्पष्ट रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।

22 हिस्सों में हुई प्लॉटिंग, 40 करोड़ से अधिक कीमत
संयुक्त जांच प्रतिवेदन के अनुसार लगभग 85,627 वर्गफीट भूमि विभिन्न लोगों को विक्रय किए जाने का उल्लेख है। जानकारी के मुताबिक इस जमीन को 22 हिस्सों में बांटकर प्लॉटिंग की गई। वर्तमान बाजार मूल्य के आधार पर इसकी कीमत 40 करोड़ रुपए से अधिक आंकी जा रही है। यही कारण है कि मामला अब केवल जमीन की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सार्वजनिक महत्व की बहुमूल्य भूमि से जुड़े बड़े विवाद का रूप ले चुका है।

पहले भी विधानसभा तक पहुंच चुका है मामला
यह विवाद पहली बार सामने नहीं आया है। वर्ष 2020 में तत्कालीन विधायक और खैरागढ़ राजपरिवार के सदस्य स्वर्गीय देवव्रत सिंह ने विधानसभा में क्षेत्र में चल रही कथित अवैध प्लॉटिंग का मुद्दा उठाया था। इसके बाद प्रशासनिक जांच भी हुई थी और कई भूखंडों को अवैध प्लॉटिंग की श्रेणी में चिन्हित किए जाने की जानकारी सामने आई थी। कुछ मामलों में रजिस्ट्रियों पर रोक लगाने की कार्रवाई भी की गई थी।

छोटे अतिक्रमणों पर कार्रवाई, बड़े मामलों में चुप्पी क्यों?
इस पूरे विवाद ने प्रशासनिक कार्रवाई पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आमतौर पर सरकारी जमीन पर छोटे अतिक्रमण की शिकायत मिलते ही प्रशासन सक्रिय हो जाता है। सड़क किनारे बनी झोपड़ियों, गुमटियों और छोटे निर्माणों पर बुलडोजर चलाने में देर नहीं लगाई जाती। लेकिन अब लोगों के बीच यह सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि यदि राजस्व रिकॉर्ड, जांच प्रतिवेदन और अन्य दस्तावेज करोड़ों रुपए मूल्य की इस जमीन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं, तो अब तक कोई बड़ी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? लोगों का मानना है कि नियमों की सख्ती कमजोर और गरीब लोगों के लिए अलग दिखाई देती है, जबकि प्रभावशाली लोगों से जुड़े मामलों में कार्रवाई की गति धीमी पड़ जाती है।

भूमिस्वामी पक्ष ने रखा अपना पक्ष
भूमिस्वामी पक्ष के प्रतिनिधि रजत भार्गव ने कहा कि उनके पास वर्ष 1974 की विधिवत पंजीकृत रजिस्ट्री, सीमांकन प्रतिवेदन और राजस्व अभिलेख उपलब्ध हैं। उनके अनुसार यह भूमि वर्षों से उनकी पत्नी स्मृति भार्गव के नाम दर्ज है और समय-समय पर उसका सीमांकन भी किया गया है। उन्होंने कहा कि यदि शासन या प्रशासन किसी भी प्रकार की जानकारी मांगता है तो सभी आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत किए जाएंगे। बिना सभी रिकॉर्ड और तथ्यों की जांच किए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

प्रभारी मंत्री ने दिए जांच के संकेत
मामले को लेकर खैरागढ़ जिले के प्रभारी मंत्री लखनलाल देवांगन ने कहा कि वह कलेक्टर से चर्चा करेंगे और उपलब्ध दस्तावेजों तथा जांच प्रतिवेदन का परीक्षण कराया जाएगा। उन्होंने कहा, “यदि कहीं नियमों का उल्लंघन हुआ है तो नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।”

जांच पर टिकी सबकी नजर
एक तरफ 52 साल पुरानी रजिस्ट्री है तो दूसरी तरफ सरकारी रिकॉर्ड में पार्क और सार्वजनिक उपयोग की भूमि का उल्लेख। एक ओर निजी स्वामित्व का दावा है, तो दूसरी ओर करोड़ों रुपए की प्लॉटिंग और सरकारी जमीन के कथित उपयोग को लेकर उठ रहे सवाल। अब पूरे मामले में प्रशासनिक जांच और शासन के फैसले पर सबकी नजरें टिकी हैं। यह विवाद सिर्फ जमीन के मालिकाना हक तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा, सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और कानून के समान अनुपालन की भी बड़ी परीक्षा बन गया है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

बारिश से पहले एक्शन मोड में सरकार, 1400 हॉटस्पॉट और 2200 किमी सीवर नेटवर्क होगा दुरुस्त

चंडीगढ़. मानसून के दौरान सीवर ओवरफ्लो और जलभराव की समस्या...

जैविक खेती और ड्रोन तकनीक से कृषि को नई उड़ान, मुख्यमंत्री साय ने गिनाए फायदे

रायपुर. आधुनिक तकनीकों, नवाचारों और किसान हितैषी नीतियों के माध्यम...

मध्यप्रदेश का मौसम बदला, भोपाल समेत कई जिलों में बारिश; 39 जिलों के लिए अलर्ट जारी

भोपाल  पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने के चलते देश में...