सरकारी कर्मचारियों को कब मिलेगी खुशखबरी? प्रमोशन का मामला CM मोहन यादव के पाले में

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भोपाल
 मध्य प्रदेश में अधिकारियों और कर्मचारियों की पदोन्नति को लेकर एक बेहद निराशाजनक खबर सामने आई है. दरअसल प्रदेश में पिछले 10 सालों से थमी हुई प्रमोशन की प्रक्रिया अब एक बार फिर कानूनी फेरबदल के भंवर में फंस गई है. हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी होने और फैसला सुरक्षित होने के बाद भी, मुख्य न्यायाधीश के सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरण के कारण अब नए सिरे से बेंच का गठन होगा और दोबारा सुनवाई की जाएगी. इससे न केवल सेवारत कर्मचारियों का इंतजार लंबा हो गया है, बल्कि राज्य की आगामी नई भर्तियों पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। 

मई 2016 से पूरी तरह ठप है पदोन्नति व्यवस्था
मध्य प्रदेश में अधिकारियों और कर्मचारियों की नियमित पदोन्नति मई 2016 से पूरी तरह से रुकी हुई है. दरअसल हाईकोर्ट द्वारा पदोन्नति नियम 2002 को निरस्त किए जाने के बाद से पूरी प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा गई है. सरकार ने प्रशासनिक काम सुचारू रूप से चलाने के लिए कई अधिकारियों को उच्च पदों का प्रभार तो सौंप दिया, लेकिन उन्हें इस पद का कोई वित्तीय लाभ प्राप्त नहीं हुआ. पद रिक्त न होने के कारण नीचे के पदों पर नई नियुक्तियां भी बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। 

​नए नियम भी कोर्ट में उलझे, सामान्य वर्ग की आपत्ति
गौरतलब ​है कि, पदोन्नति का रास्ता साफ करने के लिए राज्य सरकार ने सभी पक्षों से व्यापक विचार-विमर्श कर नए नियम तैयार किए थे. हालांकि सामान्य वर्ग के कर्मचारियों ने इन नए नियमों पर गहरी आपत्ति जताते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की गहन सुनवाई की. सरकार ने नए नियमों के पक्ष में कई मजबूत तर्क रखे और आखिरकार 17 फरवरी को अदालत ने इस पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था। 

मुख्य न्यायाधीश के सुप्रीम कोर्ट जाने से फंसा पेच
कर्मचारी नेता उमाशंकर तिवारी बताते हैं कि, ''​सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश हैं कि सामान्य परिस्थितियों में सुरक्षित रखे गए फैसलों को 90 दिनों से अधिक समय तक लंबित नहीं रखा जाना चाहिए. इसी निर्देश के कारण कर्मचारियों में उम्मीद जागी थी कि जून के प्रथम सप्ताह में अंतिम निर्णय आ जाएगा. लेकिन इसी बीच मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट में हो गई. नियमानुसार अब इस मामले की सुनवाई के लिए पहले नई बेंच का गठन किया जाएगा और नए सिरे से पूरी बहस सुनी जाएगी, जिसमें काफी समय लग सकता है। 

​ढाई लाख पदों की नई भर्तियों भी पर पड़ेगा सीधा असर
विशेषज्ञ के अनुसार, इस कानूनी गतिरोध का सीधा असर राज्य सरकार के रोजगार लक्ष्यों पर भी पड़ रहा है. सरकार ने वर्ष 2028 तक ढाई लाख पदों पर भर्ती का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है. वर्तमान में 78 हजार से अधिक पदों पर भर्ती प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, लेकिन 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का मामला लंबित होने से 13 प्रतिशत पद पहले से रुके हैं. अब प्रमोशन रुकने से पुराने पद खाली नहीं होंगे, जिससे स्वास्थ्य और ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण विभागों में नई भर्तियां पूरी तरह ठप होने की कगार पर पहुंच गई हैं। 

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