चन्नी बन सकते थे पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष! पर्यवेक्षक समिति की सिफारिश के बावजूद हाईकमान ने बदला फैसला

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चंडीगढ़ 

पंजाब कांग्रेस के भीतर एक बार फिर नेतृत्व को लेकर खींचतान तेज हो गई है. जानकारी के मुताबिक, पंजाब के राजनीतिक हालात का आकलन करने के लिए गठित कांग्रेस के तीन सदस्यीय ऑब्जर्वर पैनल ने पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की पुरजोर सिफारिश की थी। 

हालांकि, कांग्रेस हाईकमान ने इस आंतरिक फीडबैक को दरकिनार करते हुए अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को ही पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बरकरार रखा. इस फैसले के बाद पार्टी के एक धड़े में भारी नाराजगी देखी जा रही है। 

अजय माकन, मीनाक्षी नटराजन और भजन लाल जाटव की सदस्यता वाली इस हाई-प्रोफाइल कमेटी ने अपनी रिपोर्ट हाईकमान को सौंपी थी. कमेटी ने नेताओं को अलग-अलग समूहों में बांटा और उनसे अलग-अलग मुलाक़ात की. हर नेता से खास तौर पर पूछा गया कि क्या पंजाब में पार्टी के नेतृत्व में बदलाव होना चाहिए। 

तमाम बड़े से छोटे नेताओ तक से ली थी राय
कमेटी ने पंजाब के करीब 67 वरिष्ठ नेताओं से गहन विचार-विमर्श किया, जिसमें सीडब्ल्यूसी सदस्य, पूर्व मंत्री, विधायक, सांसद और जिला अध्यक्ष शामिल थे. जिनमें कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य, पूर्व मंत्री, विधायक, सांसद और DCC अध्यक्ष शामिल थे. उन्होंने अंबिका सोनी जैसे वरिष्ठ नेताओं से भी उनके आवास पर जाकर उनकी राय जानी। 

सूत्रों के मुताबिक, इस गुप्त मंथन के दौरान एक अधिकांश नेताओं ने पिछले साढ़े चार साल से पद पर काबिज राजा वड़िंग के कामकाज पर असंतोष जाहिर किया और चन्नी को कमान सौंपने की वकालत की. कमेटी ने नेताओं के बयानों को ज्यों का त्यों शामिल किया और अपनी रिपोर्ट में चन्नी को सबसे लोकप्रिय चेहरा बताया था. इस प्रक्रिया की जानकारी रखने वाले एक वरिष्ठ सूत्र ने कहा कि चन्नी काफ़ी लोकप्रिय हैं और राज्य के अन्य कांग्रेस नेताओं की तुलना में पार्टी के भीतर सबसे ज़्यादा लोकप्रिय नेता हैं। 

हाईकमान के फैसले पर उठे सवाल
पैनल की रिपोर्ट के बाद चन्नी कैंप को पूरा भरोसा था कि पंजाब में लीडरशिप में बदलाव तय है, लेकिन हाईकमान ने यथास्थिति बनाए रखते हुए राजा वड़िंग को अध्यक्ष बनाए रखा और चन्नी को केवल चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया। 

इस फैसले से हैरान कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा, "यह पूरी तरह से एक विफलता  है. जब नेतृत्व बदलने का कोई इरादा ही नहीं था, तो नेताओं से रायशुमारी करने का यह पूरा नाटक क्यों रचा गया? इसका मतलब है कि यह पूरी कवायद सिर्फ एक दिखावा थी। 

चन्नी की ताकत पर दूसरे धड़े का पलटवार
दूसरी तरफ, पंजाब कांग्रेस के भीतर एक दूसरा धड़ा इस राय से इत्तेफाक नहीं रखता. पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ नेता ने चन्नी की वास्तविक पकड़ पर सवाल उठाते हुए कहा, "इसमें कोई शक नहीं कि चन्नी कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से हैं और वे सभी निर्वाचन क्षेत्रों के नेताओं से संपर्क साध रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि वास्तव में उनके बुलाने पर कितने लोग आ रहे हैं? जब वे बैठकें बुलाते हैं, तो बमुश्किल चार-पांच विधायक पहुंचते हैं. हमारा मुकाबला भगवंत मान से है, ऐसे में अगले कुछ दिनों में तस्वीर साफ हो जाएगी कि चन्नी के साथ कितने लोग टिकते हैं। 

पंजाब कांग्रेस में हाईकमान के इस फैसले ने संगठन के भीतर नए सवाल खड़े कर दिए हैं. अब देखने वाली बात होगी कि यह असंतोष आगे चलकर शांत होता है या चुनावी तैयारियों के बीच पार्टी के लिए नई चुनौती बनता है। 

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